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‘शब्दांगन’ की शोकसभा में ‘साहित्य सुरभि’ के संस्थापक-मूर्धन्य कवि ‘गगन जी’ को दी गई भावविह्वल श्रद्धांजलि

एफएनएन ब्यूरो, बरेली। साहित्यिक संस्था ‘साहित्य सुरभि‘ के संस्थापक मूर्धन्य कवि ,एवं साहित्यकारराममूर्ति गौतम ‘गगन' के निधन पर ‘शब्दांगन’ की शोकसभा में  भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। 

साहित्यिक संसंथा शब्दांगन’ के महामंत्री वरिष्ठ साहित्यकार इंद्रदेव त्रिवेदी ने बिहारीपुर करोलान में अपने ही आवास पर शोकसभा में भावभरे हृदय से बताया कि वरिष्ठ कवि-साहित्यकार राममूर्ति गौतम ‘गगन‘ ने सात दशक लंबे अपने साहित्यिक जीवन में अनेक काव्य कृतियों की रचना की और उन्हें प्रकाशित भी कराया। उनकी एक काव्य कृति "बसंत के आंसू" का विमोचन साहित्यिक संस्था शब्दांगन के बैनर तले हुआ था।

शोकसभा में ‘शब्दांगन‘ से जुड़े साहित्यकारों डाॅ. सुरेश रस्तोगी, इंद्रदेव त्रिवेदी, गणेश ‘पथिक‘, रमेश गौतम, राजेश गौड़, रामकुमार अफरोज, राम प्रकाश सिंह ओज, ए के सिंह तन्हा, रणधीर प्रसाद गौड़ धीर, सुरेंद्र बीनू सिन्हा, रामकुमार कोली, सुरेश ठाकुर, विनय सागर जायसवाल, विशाल शर्मा, अरुण शुक्ला, रितेश साहनी, उपमेंद्र सक्सेना, रोहित राकेश, मनोज टिंकू, लोटा मुरादाबादी आदि कवि-साहित्यकार सम्मिलित रहे। शोकसभा के बाद सभी ने सामूहिक शोक प्रस्ताव पारित कर उनकी बेटी को भेजा भी है।

इस शोक प्रस्ताव में लिखा है-"रचनात्मक प्रतिभा के धनी ‘गगन’ जी के भौतिक अवसान से साहित्य जगत हतप्रभ है। सटीक, समयानुकूल, सही, समझदारी, संयमित और समाज हित में लिखी उनकी रचनाओं के संग्रहों ने हमेशा ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से आत्मिक संतुष्टि प्रदान की है। साथ ही इन सभी कालजयी काव्य कृतियों के माध्यम से उन्होंने सनातन धर्म के महान उच्चादर्शों, घृणा-द्वेष, कुंठा, स्वार्थ से ऊपर उठकर सर्व धर्म समभाव और विश्व बंधुत्व का परचम लहराने और मानव, जीव-जंतुओं की सेवा, उनके प्रति दया, करुणा, प्यार, स्नेह, विश्वास, सह अस्तित्व और मान-सम्मान तथा मानव जीवन के शाश्वत मूल्यों को हर पूजा-इबादत से बहुत ऊपर स्थान देकर अपने साहित्यिक दायित्व और कवि धर्म का भी बहुत कठोरता, आत्म निग्रह से सदैव शत-प्रतिशत निर्वाह किया है। साहित्य की अमूल्य-बेजोड़ निधि के रूप में जो कुछ भी गगन जी छोड़ गए हैं वह कवि-साहित्यकारों के चुनौतियों भरे कवि कर्म में पग-पग पर अमृतमय पाथेय सिद्ध होकर उन्हें संजीवनी शक्ति देता रहेगा। ‘गगन’ जी का भौतिक अभाव और बहुत बड़ी साहित्यिक रिक्ति निश्चित ही लंबे समय तक बरेली के कवि समाज के अंतर्मनों को  कचोटती ही रहेगी।”

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