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झंझावाती वातावरण में शीतल-मंद पुरवइया का संजीवनी झोंंका है ‘काव्यामृत’ साहित्यिक पत्रिका

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विकट प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए सात वर्ष से अपने दम पर निरंतर निकाल रहे चतुर्मासिक पत्रिका

फ्रंट न्यूज नेटवर्क ब्यूरो, बरेली। जब छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं असमय ही दम तोड़ रही हों तो ऐसे प्रतिकूल वातावरण में तमाम झंझावात झेलते हुए किसी साहित्यिक पत्रिका का पिछले सात वर्ष से अनवरत् नियमित प्रकाशन निश्चित ही मंद-मंद पुरवइया के शीतल झोंकों जैसे अमृतमय आनंद की अनुभूति कराता है। बीसलपुर )पीलीभीत) के वरिष्ठ कवि-साहित्यकार डॉ. थम्मनलाल वर्मा द्वारा संपादित चतुर्मासिक ‘काव्यामृत’ पत्रिका का मई-दिसंबर 2024 संयुक्तांक मेरे हाथों में है। विद्वान संपादक ने 48 पृष्ठों की इस पत्रिका में कविता, लघु उपन्यास, लघुकथा जैसी साहित्य की विभिन्न विधाओं का समृद्ध साहित्यिक कलेवर समेटने की सफल-सार्थक कोशिश की है और अपने इस सारस्वत उद्यम के लिए वे निश्चित ही बधाई और साधुवाद के पात्र हैं। अपरिहार्य विषम परिस्थितियों और विकट प्रतिकूलताओं से जूझते हुए पत्रिका भले ही दो अंकों को मिलाकर संयुक्तांक के रूप में प्रकाशित होकर आई है, लेकिन इसमें समाहित सामग्री को संतोषजनक अवश्य कहा जा सकता है।

भारती मिश्रा की ‘कुतरी’ को कहानी कहें या लघु उपन्यास, लेकिन मार्मिक संवेदनाओं को सशक्त स्वर देने वाली यह रचना इस पत्रिका का विशेष आकर्षण अवश्य है। अपनी इस रचना के माध्यम से लेखिका ने स्वार्थ में घिरी नितांत आत्मकेंद्रित सोच पर कठोर प्रहार किया है और निरीह, बेजुबान जीव-जंतुओं की पीड़ा को समझते हुए खुद को संकट में डालकर भी उनकी मदद के लिए आगे आने की मानवीय सोच और संवेदना के स्वीकार का सनातन संदेश दिया है। लेखिका की कलम से भविष्य में अन्य अनेक साहित्यिक रचनाएं निकलने की आशा-अपेक्षा अवश्य की जा सकती है।

डॉ. थम्मनलाल वर्मा, संपादक-काव्यामृत एवं वरिष्ठ कवि-साहित्यकार

पत्रिका में शिमला शर्मा की लघु कथा ‘कन्या भ्रूण हत्या’ भी वर्ष में दो बार देवी पूजन वाले देश में बेटियों पर बेटे की चाहत में बेटी की गर्भ में ही हत्या करवा देने वाली निंदनीय, दकियानूसी सोच को अपने लघु कलेवर में भी बड़ी खूबसूरती से सामने लाती है। यद्यपि इस पत्रिका की दूसरी लघुकथा रामकिशोर वर्मा की ‘चाय’ लघुकथा के बजाय व्हाट्सएप की सतही टिप्पणी ही अधिक लगती है। इस पत्रिका में 60 से भी अधिक स्थापित और नवोदित कवियों की काव्य रचनाएं संकलित हैं जो पत्रिका के ‘काव्यामृत’ नाम को सार्थक करती हैं।

डॉ. विजेंद्रपाल शर्मा, डॉ. गीता मिश्रा ‘गीत’, आचार्य कृष्ण कुमार मिश्र ‘चंचल’, डॉ. कौशल पांडेय ‘आस’, रुद्रप्रताप ‘रुद्र’, डॉ. थम्मनलाल वर्मा, रघुवंश तिवारी ‘अडिग’, रामकिशोर वर्मा के घनाक्षरी-छंद, दोहे विशेष रूप से लुभाते हैं। विनय साग़र जायसवाल, डॉ. दिनेश समाधिया ‘दिनेश’, जितेंद्र कमल आनंद, शिवशंकर यजुर्वेदी, श्रीकृष्ण शुक्ल, अमित वर्मा ‘अम्बर’, कमल ‘मानव’, मूरख बीसलपुरी, नवनीत मिश्र ‘नवल’, ब्रजेश तिवारी ‘ब्रजेश’, गेंदनलाल कनौजिया, श्रीकांत तिवारी ‘कांत’, डॉ. अजय ‘अविरल’ रस्तोगी, डॉ. अमित कुमार, आशुतोष मिश्र, चंद्रशेखर दीक्षित, सुशील दीक्षित ‘विचित्र’, अनूप मिश्र ‘तेजस्वी’, राघव शुक्ल, दीपिका शर्मा, डॉ. यशोधरा यादव ‘यशो’, डॉ. महाराणा प्रताप सिंह ‘विद्रोही’, नितिन त्रिगुणायत, बौद्ध रामबाबू ‘पिप्पल’, अखिलेश त्रिपाठी ‘केतन’ के गीत-छंद बहुत पठनीय, गेय और संग्रहणीय बन पड़े हैं और इस पत्रिका को पठनीय, संग्रहणीय बनाने में सफल हैं। रमेश गौतम, हिमांशु श्रोत्रिय ‘निष्पक्ष’, विवेक ‘आस्तिक’ के नवगीत पत्रिका को स्तरीय बनाने में सक्षम हैं। शिवशंकर यजुर्वेदी, नंदीलाल ‘निराश’, आयुष ‘आवर्त’, गिरीश पांडेय बनारसी, शिमला शर्मा, डॉ. शशि जोशी, आदर्श कुशवाहा, बसंत ठाकुर, प्रवीण पारीक, विनय विक्रम सिंह की ग़ज़लें और डॉ. सूर्यनारायण गुप्त, रामकिशोर वर्मा के हाइकु भी काव्य प्रेमियों के मनु मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। पत्रिका में वरिष्ठ कवि-पत्रकार-समीक्षक गणेश ‘पथिक’ की डॉ. महेश मधुकर के बालगीत संग्रह भारत की पहचान तिरंगा’ और प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. अनूप सिंह की नवगीतकार राजेंद्र सिंह ‘राजन’ के 90 चर्चित नवगीतों के संकलन ‘हँसते गुम्बद छत के’ की निष्पक्ष-सटीक-उत्कृष्ट समीक्षाएं भी विशेष रूप से प्रभावित करती हैं और साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों को इन दोनों बेहतरीन काव्य संकलनों को खरीदकर पढ़ने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित भी करती हैं। पत्रिका में साहित्यिक गतिविधियों के समाचार और पुरस्कारों की सूचनाएं देकर संपादक ने इसे और भी अधिक उपयोगी बना दिया है। पत्रिका की एक विशेषता विभिन्न साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के नि:शुल्क प्रकाशित विज्ञापन भी इस पत्रिका को विशिष्ट और उपयोगी सिद्ध करते हैं। वैसे यदि नवोदित कवियों को पत्रिका में अलग से एक कॉलम में एक साथ स्थान दिया जाता तो इस पत्रिका की संपादकीय सुगढ़ता और सुंदरता और भी बढ़ सकती थी। पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित होती रहे और सही समय पर पाठकों के हाथों में पहुंचती रहे, इसका दायित्व संपादक मंडल के साथ रुहेलखंड क्षेत्र के सभी साहित्य प्रेमियों, व्यवसायियों और उद्यमियों को भी अपने हाथों में लेना ही होगा। अंत में पत्रिका के नियमित प्रकाशन तथा और भी उत्कृष्ट संपादन की संपादक डॉ. थम्मनलाल वर्मा जी को अनंत-अशेष शुभकामनाएं…!!!

-समीक्षक: गणेश ‘पथिक’, खिरका, बरेली

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