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उड़ीसा की कवयित्री मंजुला अस्थाना मोहंती का बरेली में सारस्वत अभिनन्दन

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कवि गोष्ठी आयोजन समिति की नियमित मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने बिखेरे विविध रंग

फ्रंट न्यूज नेटवर्क ब्यूरो, बरेली। शहर की प्रतिष्ठित एवं प्राचीनतम साहित्यिक संस्था कवि गोष्ठी आयोजन समिति के तत्वावधान में सरस काव्य गोष्ठी एवं सम्मान समारोह में भुवनेश्वर उड़ीसा से आईं चर्चित कवयित्री डॉ. मंजुला अस्थाना मोहंती का स्वर्गीय ज्ञानस्वरूप कुमुद साहित्य सम्मान प्रदान कर सारस्वत अभिनन्दन किया गया। स्वर्गीय कुमुद जी के सुपुत्र एवं संस्था के सचिव उपमेंद्र सक्सेना एड. ने श्रीमती डॉ. मोहंती को स्मृति चिह्न भेंटकर और शॉल, पटका पहनाकर सम्मानित किया।

अतुल सक्सेना के संयोजकत्व में सतीपुर चौराहा, पीलीभीत बाईपास रोड के निकट स्थित सोम आयुर्वेद पंचकर्मा हॉस्पिटल में आयोजित इस साहित्यिक आयोजन की अध्यक्षता मूर्धन्य साहित्यकार एवं संस्थाध्यक्ष रणधीर प्रसाद गौड़ 'धीर' ने की। मुख्य अतिथि पद की गरिमा श्रीमती डॉ. मोहंती ने बढ़ाई जबकि विशिष्ट अतिथियों के रूप में वरिष्ठ कवयित्री शिवरक्षा पांडेय, ज्ञानदेवी वर्मा ‘सत्यम’ एवं मीनाक्षी अस्थाना मंच पर विराजमान हे।

माॅं शारदे के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर साहित्य एवं सामाजिक क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान के लिए उड़ीसा के भुवनेश्वर जनपद से पधारीं साहित्यकारा मंजुला अस्थाना 'मोहंती' को ज्ञान स्वरूप 'कुमुद' साहित्य सम्मान प्रदान किया गया सम्मान स्वरूप शाॅल एवं स्मृति चिन्ह सचिव उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट द्वारा प्रदान किया गया।

सरस काव्य गोष्ठी में कवियों ने मानवीय संवेदनाओं के कोमलकांत कलेवर को अपनी रचनाओं से जोड़कर उत्कृष्ट काव्य प्रस्तुतियाॅं दीं और देर शाम तक समां बाॅंधे रखा।

अपने सारस्वत सम्मान से अत्यधिक अभिभूत मुख्य अतिथि

डॉ. मंजुला सक्सेना मोहंती ने स्वरचित ग़ज़ल संग्रह से अपनी यह खूबसूरत ग़ज़ल तरन्नुम में सुनाई तो सदन में उपस्थित सभी कविजन वाहवाह करते और तालियां बजाते रहे-
फलक से टूट सितारा जमीं पर आया है।
खूब फुरसत से खुदा ने तुझे बनाया है।
कीमती गहनों दिलकश पोशाकों की जरूरत किसे?
मुकम्मल मुजस्समा रब ने तुझे बनाया है।

कवि-साहित्यकार डॉ. महेश मधुकर ने अपने बहुचर्चित गीत सुनाए और खूब तालियां बजवाईं-

जीवन का पथ बहुत कठिन है,
सॅंभल-सॅंभल कर चलना भाई।
है घुमाव हर एक मोड़ पर,
ठौर-ठौर बैठी कठिनाई।।

++++

कर्मरत् रहना न हिम्मत हारना आघात पर।
ध्यान देना ही नहीं आलोचकों की बात पर।।
हो इरादा पूर्ण तो निश्चित वरेगी सफलता,
दीप दृढ़ विश्वास का जलता रहेगा रात भर।

वरिष्ठ कवि डॉ. शिवशंकर यजुर्वेदी स्वास्थ्य काफी खराब होने के बावजूद गोष्ठी में पहुंचे और अपने इस सदाबहार गीत से प्रकृति चित्रण के अनूठे-अभिराम रंग भरकर वातावरण को खुशनुमा बना दिया और खूब तालियां बटोरीं-

शीत ऋतु आ गई
गुनगुनी धूप है।
धूप में आओ हम तुम नहा लें प्रिये।
भूलकर सब विषमताएं
संसार की चंद पल ही सही मुस्करा लें प्रिये।

समारोह की विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कवयित्री शिवरक्षा पांडेय ने दिल्ली में लालकिले के पास हालिया आतंकी विस्फोट में धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों के वीभत्स आतंकी चेहरे बेनकाब होने पर राष्ट्रप्रेमियों की अकथनीय व्यथा और उग्र आक्रोश को अभिव्यक्त करता यह मर्मस्पर्शी गीत सस्वर गाकर सुनाया तो तालियों की गड़गड़ाहट और भावविह्वल पलों के बीच इसकी प्रत्येक पंक्ति को पूरे सदन द्वारा बार-बार सराहा गया-

मनुज तन में दनुज शैतान निकले
लिए डॉक्टर का पद हैवान निकले।
रोगी का दुख हरने वाले अपने पेशे के प्रति बेईमान निकले।

कवि-पत्रकार गणेश ‘पथिक’ ने युवा शक्ति का आह्वान करते अपने इस चर्चित-ओजस्वी गीत से खूब तालियां-वाहवाही और प्रशंसा बटोरी-

खून में जिसके रवानी है,

नाम उसका ही जवानी है।

हाथ में निज पूर्वजों की खड्ग लेकर

गर्वीले निज विगत से प्रारब्ध लेकर

ऐ ‘पथिक’ पाथेय संचित कर रही जो-

अनमिटी वो इक निशानी है।

वरिष्ठ कवि-ग़ज़लकार राज शुक्ल ग़ज़लराज को उनकी इस ग़ज़ल के हर शेर पर भरपूर दाद और तालियां मिलीं-

ये सच है कि ग़म का ख़जाना भी है
सफ़र जिंदगी का सुहाना भी है।

ये दीवानगी ही है आँखों में आँसू
भी हैं औ लबों पर तराना भी है।

है कैसी ये बंदिश कि हमको मुहब्बत
जताना भी है और छिपाना भी है।

तजुर्बा बुजुर्गों का ए राज सच में
है अनमोल भी और पुराना भी है

समारोह की अध्यक्षता कर रहे रणधीर गौड़ ‘धीर’ ने भी अपने गीत, ग़ज़ल और कविताओं से खूब वाहवाही लूटी-

नाम जो श्रीराम का मुख पर कभी लाता नहीं।
भोगता है नरक को मोक्ष वो पाता नहीं।

****

इश्क की फितरत वहां बदनाम होकर रह गई।
जिंदगी का आखिरी पैग़ाम होकर रह गई।

संस्था के सचिव उपमेंद्र सक्सेना एड. ने स्वनामधन्य स्वर्गीय पिता, संस्था के संस्थापक अध्यक्ष एवं जनप्रिय कवि स्वर्गीय ज्ञानस्वरूप ‘कुमुद’ जी की भावपूर्ण स्मृतियों को समर्पित अपना यह मनभावन-चर्चित गीत सुनाकर खूब तालियां और वाहवाहियां बटोरीं-

आई पढ़ने की बारी, अच्छी शिक्षा दिलवाई।
कर्जा भी लिया उन्होंने, धी इसमें छिपी भलाई।
सोचा अपना बच्चा भी, दुनिया में नाम कमाए।
चले गए जग से पापा, अंतस् में पीर छिपाए।

कार्यक्रम में डॉ. महेश मधुकर , अतुल सक्सेना, डॉ. मुकेश 'मीत', सुभाष रावत राहत बरेलवी, अलका गुप्ता, लक्ष्वेश्वर राजू, अमित मनोज, उमेश अद्भुत, डॉ. राम शंकर शर्मा प्रेमी, प्रताप मौर्य 'मृदुल', रामकुमार भारद्वाज ‘अफरोज, मनोज दीक्षित टिंकू, राजकुमार अग्रवाल ‘राज़’, रामधनी निर्मल, सुरेश राठौर, मुकेश सोम एवं शिव नारायण साहू आदि उपस्थित रहे।

वरिष्ठ कवि-ग़ज़लकार राज शुक्ल ‘ग़ज़लराज’ ने अपनी सटीक आशु कविताओं से इस कवि गोष्ठी का अत्यंत सरस-सफल, प्रभावशाली एवं स्मरणीय संचालन किया।

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