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बरेली में ‘साहित्य सुरभि’ की 377वीं मासिक काव्य गोष्ठी में हुई श्रृंगार, व्यंग और अध्यात्म की बरसात

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फ्रंट न्यूज नेटवर्क ब्यूरो, बरेली। प्रतिष्ठित ‘साहित्यिक संस्था ‘साहित्य सुरभि’ की हर माह के तीसरे रविवार को होने वाली नियमित मासिक कवि गोष्ठी संस्थाध्यक्ष रामकुमार कोली के आवास पर आयोजित की गई। बरेली के वरिष्ठतम साहित्यकार स्मृतिशेष आदरणीय राममूर्ति गौतम ‘गगन’ द्वारा वर्ष 1994 में स्थापित की गई इस प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था की 377वीं मासिक काव्य गोष्ठी में बरेली और आसपास के दो दर्जन से अधिक साहित्यकारों ने भाग लिया और अपनी प्रतिनिधि रचनाओं के सुरभित प्रसूनों से स्मरणीय साहित्यिक आहुति दी।

गोष्ठी वरिष्ठ कवि रणधीर प्रसाद गौड़ ‘धीर’ की अध्यक्षता और चर्चित गजलकार रामकुमार भारद्वाज ‘अफरोज’ के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुई। मनोज दीक्षित ‘टिंकू’ ने अलग ही अंदाज में बेहद सफल संचालन किया। उन्होंने नरोत्तम दास द्वारा लिखित सुदामा चरित्र को मधुर भाषा में सुनाते हुए कविगणों को आमंत्रित किया।
मां सरस्वती को नमन करने के बाद कवि हरीकांत मिश्र ‘चातक’ ने श्रृंगार रस की सरस रचना से गोष्ठी का शुभारंभ किया-
“मद रूपसी नवल श्रृंगार करती, चंचल चितवन से वार करती’
मनोज सक्सेना ने ऋतुराज नाम की अपनी कविता से प्रकृति सुंदरी का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया
“उगता सूरज पूरब से लेकर किरनों का जाल। लालिमा से उसकी होता सारा अंबर लाल”।।

हास्य-व्यंग के क्षेत्र में बड़ा स्थान रखने वाले दीपक मुखर्जी ‘दीप’ ने इस व्यंग से सबका ध्यान खींचा- अब्दुल जोरों से चिल्लाया, यह सब सिरफिरे हैं इधर-उधर फट रहे हैं, इन्हें भारत का ज्ञान नहीं है।

डॉ बीएन शास्त्री ने राष्ट्र प्रेम की कविता पढ़ते हुए कहा”अपने-अपने धर्म पर बहुत मिटे हैं। मिट सको तो देश के निशान पर मिटो।” बरेली में हिंदी गजल को एक नया आयाम देने वाले अफरोज ने यों कहा “अभिनय करते दादी मां का, पोती-पोते नटखट कितने। “हास्य कवि मनोज टिंकू ने इन पंक्तियों से सबको हंसाया-गुदगुदाया, बाप के फोटो को क्या सजाना हुआ, अपनी मुट्ठी में उनका खजाना हुआ।”
संस्थाध्यक्ष रामकुमार कोली ने स्वतंत्रता समारोह सप्ताह में गांवों-शहरों में शान से फहराते तिरंगे के सम्मान में बेहतरीन काव्यपाठ किया—
“तिरंगा है पथ पर तिरंगा है छत पर, तिरंगा है रथ पर सबके ही साथ में। तिरंगा है बालक पे, तिरंगा है चालक पे, तिरंगा संचालन पे संग हाथ हाथ में।।”
राजकुमार अग्रवाल ‘राज़’ ने अपने दिल की बात इस प्रकार प्रस्तुत की”न इश्क की न मुश्क की, न जाफरान की खुशबू, मेरी सांसों में बसी है मेहरबान की खुशबू ।”

लोकगीत गायक रामधनी ‘निर्मल’ ने आज की नारी के सुंदर स्वरूप पर “सरकी चुनरिया सर-सर सरकी” गीत प्रस्तुत कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। आज के अध्यक्षता कर रहे रणधीर गौड़ ‘धीर’ ने इस गीत से गोष्ठी को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर पहुंचाया-“इस काया के रोम रोम में लाखों देवस्थान छुपे हैं, ढूंढ सके तो ढूंढ बटोही तुझ में ही भगवान छुपे हैं।”
संस्था के महासचिव डॉक्टर राजेश शर्मा ‘ककरेली’ ने कविता की संरचना को कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया
” शब्द हमने चुना, भाव तुम भेज दो, शब्द-भावों से कविता बन जाएगी।”
पुनः सफल गोष्ठी के लिए संस्थाध्यक्ष रामकुमार कोली ने सभी का आभार जताया। साथ ही संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय राममूर्ति गगन को याद करते हुए उनसे जुड़े कुछ प्रेरक संस्मरण भी साझा किए।
महासचिव डॉ़. ‘ककरेली’ ने सभी कवियों के प्रति आभार जताया।

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