एफएनएन , मुजफ्फरपुर : भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक परंपराओं और मानवीय मूल्यों का भी संदेश देते हैं। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की आराधना के साथ नारी शक्ति का सम्मान किया जाता है। इसी पर्व से जुड़ी एक ऐसी मान्यता है, जो धार्मिक आस्था के साथ समाज में व्याप्त भेदभाव और समानता के सवालों को भी सामने लाती है।
बिहार के मुजफ्फरपुर में चतुर्भुज स्थान के रेड लाइट इलाके से दुर्गा प्रतिमा निर्माण के लिए मिट्टी लेने की परंपरा प्रचलित है। इस मान्यता के अनुसार, वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को देवी की प्रतिमा बनाने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में शामिल किया जाता है। यह परंपरा बंगाल में भी प्रचलित बताई जाती है।
बंगाल से बिहार तक प्रचलित है मान्यता
दुर्गा पूजा के दौरान प्रतिमा निर्माण के लिए अलग-अलग स्थानों से मिट्टी एकत्र करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसमें गंगा तट, खेत, मंदिर परिसर और वेश्यालय के आंगन की मिट्टी भी शामिल बताई जाती है। हालांकि, इस परंपरा के स्वरूप और मिट्टी के स्रोतों की संख्या को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं हैं।
मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान में भी कुछ मूर्तिकार और श्रद्धालु इस परंपरा का पालन करते हैं। उनके अनुसार, आंगन से लाई गई मिट्टी को अन्य मिट्टी के साथ मिलाकर प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है।
सामाजिक भेदभाव और धार्मिक आस्था का विरोधाभास
इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण पहलू समाज की सोच से जुड़ा है। जिन महिलाओं को अक्सर सामाजिक भेदभाव और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, उनके घर के आंगन की मिट्टी को धार्मिक परंपरा में शुभ माना जाता है।
यह मान्यता पवित्रता और अपवित्रता से जुड़ी सामाजिक धारणाओं पर सवाल खड़े करती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति के आधार पर उसके सम्मान और गरिमा को कम नहीं आंका जाना चाहिए।
मिट्टी लेने आने वाले लोगों से मिलता है सम्मान का एहसास
चतुर्भुज स्थान में रहने वाली सना (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि दुर्गा पूजा के समय उनके घर के आंगन की मिट्टी लेने के लिए लोग पहुंचते हैं। उनके अनुसार, कुछ लोग मिट्टी लेने के बदले 251 या 551 रुपये शगुन के तौर पर भी देते हैं।
सना कहती हैं, “अगर हम लोगों के दरवाजे की मिट्टी दुर्गा प्रतिमा में नहीं लगेगी, तो उसे शुभ नहीं माना जाएगा। अच्छे-अच्छे घरों से भी लोग 251 या 551 रुपये शगुन के तौर पर देकर हमसे मिट्टी लेकर जाते हैं। हम लोग खानदानी हैं, कई पीढ़ियों से नाच-गाना करते आ रहे हैं।”
उनके लिए यह परंपरा सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता का एहसास कराती है।
पुरानी परंपरा को गर्व से देखती हैं स्थानीय महिलाएं
चतुर्भुज स्थान में जन्मीं सेक्स वर्कर की बेटी नसीमा (बदला हुआ नाम) इस परंपरा को पुराना और पवित्र मानती हैं। उनका कहना है कि मान्यता के अनुसार, नाच-गाने से जुड़ी महिलाओं के घर की मिट्टी भी मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में शामिल की जाती है।
नसीमा के मुताबिक, पुरोहितों और पंडितों के बीच प्रचलित मान्यता में सात अलग-अलग स्थानों की मिट्टी का उल्लेख मिलता है। इसमें उनके घर के आंगन की मिट्टी भी शामिल मानी जाती है। वह इसे अपने लिए गर्व और सम्मान की बात बताती हैं।
20 वर्षों से प्रतिमा बना रहे मूर्तिकार ने बताई परंपरा
प्रतिमा निर्माता विक्की कुमार बताते हैं कि वह 20 वर्षों से अधिक समय से मूर्ति निर्माण के काम से जुड़े हैं। उनके अनुसार, दुर्गा प्रतिमा बनाने में अलग-अलग स्थानों की मिट्टी इस्तेमाल करने की धार्मिक मान्यता है।
विक्की कुमार का कहना है कि मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को भी विशेष महत्व दिया जाता है। उन्होंने बताया कि पांच से सात अलग-अलग स्थानों की मिट्टी मिलाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, बिहार में इस परंपरा का पालन करने वाले कारीगर अपेक्षाकृत कम हैं, जबकि बंगाल में इसका प्रचलन अधिक बताया जाता है।
परंपरा के पीछे सुनाई जाती है देवी की भक्ति से जुड़ी कथा
मुजफ्फरपुर के हरिसभा चौक से जुड़े बंगाली समाज के सदस्य देव आशीष इस परंपरा के पीछे एक प्रचलित लोककथा बताते हैं। उनके अनुसार, एक वेश्या मां दुर्गा की अनन्य भक्त थी। मान्यता है कि देवी ने उसके सपने में आकर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके आंगन की मिट्टी से प्रतिमा बनाने को कहा था।
इस कथा में गौमूत्र, गंगा की मिट्टी, पुआल और गोबर जैसी सामग्रियों से प्रतिमा तैयार करने का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, यह कथा धार्मिक लोकमान्यता के रूप में प्रचलित है।
देव आशीष के अनुसार, इस परंपरा का सामाजिक संदेश यह है कि भक्ति और समर्पण के सामने किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान को छोटा नहीं समझना चाहिए।
चतुर्भुज स्थान में स्थित है प्राचीन विष्णु मंदिर
मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान की पहचान केवल रेड लाइट इलाके के रूप में नहीं है। यहां भगवान विष्णु का एक प्राचीन चतुर्भुज मंदिर भी स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर की स्थापना शक संवत 1354 में हुई थी और यहां स्थापित विष्णु की प्रतिमा लगभग 700 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
मंदिर के पुजारी नवल किशोर मिश्रा बताते हैं कि प्रचलित कथा के अनुसार, मुजफ्फरपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर कुढ़नी प्रखंड के तुर्की गांव में तालाब की खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी।
मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के अलावा शिव, गणेश, आदिशक्ति, भैरव, सूर्य और हनुमान की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
मंदिर की उपेक्षा और सामाजिक पहचान का सवाल
मंदिर के पुजारी नवल किशोर मिश्रा के अनुसार, मंदिर के पास पर्याप्त जमीन है और इसका इतिहास भी काफी पुराना है। इसके बावजूद इलाके की बदली हुई छवि के कारण कई लोग यहां आने से कतराते हैं, जिससे मंदिर की उपेक्षा हो रही है।
दुर्गा प्रतिमा के लिए मिट्टी लेने की यह परंपरा धार्मिक मान्यताओं के साथ समाज में सम्मान, समानता और स्वीकार्यता जैसे मुद्दों को भी सामने लाती है। यह सवाल उठाती है कि जब किसी स्थान या व्यक्ति से जुड़ी चीज को धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है, तो उसी व्यक्ति को सामाजिक जीवन में सम्मान देने में हिचकिचाहट क्यों होती है।








