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“…सातों आकाशों के ऊपर देखा मां लिक्खा!”

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राष्ट्रीय कवि संगम’ ब्रज प्रांत और बरेली की प्रतिनिधि साहित्यिक संस्था ‘साहित्य सुरभि’ के संयुक्त तत्वावधान में सरस कवि सम्मेलन का आयोजन

जितेंद्र कमल आनंद की कृति ‘आनंद छंद माला-भाग 3’ का विमोचन हुआ, वरिष्ठ कवि सुरेश ठाकुर का ‘गगन साहित्य सम्मान-2025’ से अभिनंदन भी किया गया

एफएनएन ब्यूरो, बरेली। राष्ट्रीय कवि संगम ब्रज प्रांत और साहित्य सुरभि बरेली के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ कवि-साहित्यकार/ गोलोकवासी श्री राममूर्ति गौतम ‘गगन’ की पावन स्मृति में सरस कवि सम्मेलन और गगन साहित्यकार सम्मान समारोह-2025 बरेली के स्टेडियम रोड स्थित खुशलोक हॉस्पिटल सभागार में आयोजित किया गया।

मंचासीन अतिथियों द्वारा मां वीणापाणि के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन-पुष्पार्चन के उपरांत रीतेश साहनी की सस्वर वाणी वंदना से कर समारोह का शुभारम्भ हुआ।

विशिष्ट अतिथि दिल्ली से आए आमंत्रित चर्चित मंचीय कवि मोहन मुंतज़िर ने अपनी इस भावपूर्ण ग़ज़ल से कवि सम्मेलन को ऊंचाइयों पर पहुंचाया और हर शेर पर खूब तालियां और वाहवाही भी बटोरीं-
जब भी तूफानों से बचकर निकला हूं,
देखा है लहरों पर मैंने मां लिक्खा
कल ख्वाबों में देखी जन्नत तो देखा,
सातों आकाशों के ऊपर देखा मां लिक्खा।
शेर मेरे बतियाने लगे हैं ग़ालिब से,
जिस दिन से मैंने कागज पर मां लिक्खा।
एक अनाथ अमीर ने अन्तिम सांसों से
जाते-जाते दीवारों पर मां लिक्खा‌।

मोहन मुन्तज़िर

समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र कमल आनंद की छंद लेखन विधा का बोध कराती पुस्तक ‘आनंद छंद माला-भाग-3’ का मंचासीन अतिथि कवियों द्वारा विमोचन किया गया। पंतनगर से आए वरिष्ठ ग़ज़लकार केपी सिंह ने भी अपनी लाजवाब ग़ज़लों से कवि सम्मेलन को यादगार बना दिया। उन्हें भी काव्य रसिक श्रोता समूह पूरे समय तालियों की गड़गड़ाहट और वाहवाह से नवाजता ही रहा-
देखते-देखते शम्स ढल जाएगा,
हाथ से वक्त यूं ही निकल जाएगा।
छोड़के ये ज़हां सबको जाना ही है,
आज कोई गया कल कोई जाएगा।

‘साहित्य सुरभि’ के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय राममूर्ति गौतम ‘गगन’ की पावन स्मृति में उनके सबसे करीबी मित्र सुरेश ठाकुर ने सुरों से सजा यादगार गीत सुनाकर सबकी आंखों को नम और दिलों को बोझिल कर दिया। उन्हें और अन्य सभी मंचासीन आमंत्रित कवियों को भी ‘गगन साहित्य सम्मान-2025’ से अलंकृत किया गया।

बरेली में बड़े और स्मरणीय सारस्वत समारोह के संयोजक और वरिष्ठ मंचीय कवि विश्वजीत ‘निर्भय’ ने अपनी इस खूबसूरत-दिलकश ग़ज़ल से पूरे सदन की प्रशंसा प्राप्त की-
कहां ले जाएगी आखिर हमें तकदीर- देखेंगे,
कसेगी कब तलक पांवों को ये जंजीर- देखेंगे।
आंखों से भले ही तेरा अक्स दूर हो जाये,
हम आंखें बंद करके भी तेरी तस्वीर देखेंगे।
दिल्ली से आई कवयित्री नमिता ‘नमन’ के इस श्रांगारिक गीत पर भी सब वाहवाह करते रहे-
जो हमने साथ खाई थी कसम वो तोड़ क्यों बैठे,
विरह की आग में जलता हुआ तन छोड़ क्यों बैठे?
हाथरस से आई कवयित्री गीता सिंह ‘गीत’ ने अपने इस खूबसूरत से गीत पर सबकी तारीफ और तालियां बटोरीं-
दिल कभी तुम किसी का दुखाना नहीं,
छोड़ अपनों को तुम दूर जाना नहीं।
ग्वालियर से आई कवयित्री डॉ. मनीषा गिरी ने
सुनाया-
मेरे प्रियतम मेरे जीवन को तुम ऐसे सजा देना,
कि जैसे बांसुरी पर मोरपंखों सा लगा देना।
सीतापुर से आई कवयित्री हेमा पांडेय ने यह सुंदर-सुरीला गीत सुनाकर वाहवाही लूटी-
दिल पे मेरे कोई वार सा हो गया,
तेरा मिलन उपहार सा हो गया।
संयोजक कमलकांत श्रीवास्तव की ग़ज़ल, गीत की हर पंक्ति पर भी तालियां बजती रहीं-
औरों के लिए जी लो जग में,
बस नाम यहां रह जाता है, कदमों के निशां छोड़ो अपने,
बस शेष यही रह जाता है।

कवि सम्मेलन का काव्यमय सफल संचालन मंचों के चर्चित कवि रोहित ‘राकेश’ ने किया। नवाबगंज से आए मंचों के सिद्धहस्त कवि डॉ.चैतन्य ‘चेतन’ का सुरीला होली गीत और जाने-माने शायर सुभाष राहत बरेलवी की ग़ज़लें भी खूब सराही गईं।

‘साहित्य सुरभि’ के वर्तमान अध्यक्ष रामकुमार कोली, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा ‘ककरैली’, रामकुमार भारद्वाज ‘अफरोज़’, राजबाला धैर्य, गणेश ‘पथिक’, प्रकाश निर्मल, प्रताप मौर्य ‘मृदुल’, ध्रुव यदुवंशी, डॉ़. रामशंकर प्रेमी, एके सिंह ‘तन्हा’ आदि ने भी अपने उत्कृष्ट काव्यपाठ से प्रभावित किया। सभी स्थानी़य कवियों का भी सारस्वत अभिनन्दन किया गया। भाजपा नेत्री राशि, प्रसिद्ध फिल्मकार श्री वालिया समेत छह दर्जन से अधिक काव्य रसिकों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

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