विशिष्ट अतिथि दिल्ली से आए आमंत्रित चर्चित मंचीय कवि मोहन मुंतज़िर ने अपनी इस भावपूर्ण ग़ज़ल से कवि सम्मेलन को ऊंचाइयों पर पहुंचाया और हर शेर पर खूब तालियां और वाहवाही भी बटोरीं-
जब भी तूफानों से बचकर निकला हूं,
देखा है लहरों पर मैंने मां लिक्खा
कल ख्वाबों में देखी जन्नत तो देखा,
सातों आकाशों के ऊपर देखा मां लिक्खा।
शेर मेरे बतियाने लगे हैं ग़ालिब से,
जिस दिन से मैंने कागज पर मां लिक्खा।
एक अनाथ अमीर ने अन्तिम सांसों से
जाते-जाते दीवारों पर मां लिक्खा।