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‘भारत की पहचान तिरंगा’: नटखट किंतु सहृदय बालमन का काव्यमय जीवंत दस्तावेज

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अपने नए बालगीत संग्रह में बच्चा बनकर खेल-खेल में बड़ी कुशलता से बच्चों को जीवन जीने की कला सिखा देते हैं कविश्रेष्ठ डॉ. महेश मधुकर

मूलत: अलीगंज (एटा) निवासी और बरेली के पीलीभीत रोड स्थित पवन विहार में आवास बनाकर रह रहे एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली से वरिष्ठ सहायक पद से सेवानिवृत्त डॉ. महेश मधुकर साहित्य जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। काव्य प्रेमियों और आलोचकों-समीक्षकों द्वारा बहुप्रशंसित और बहुचर्चित दो खंड काव्यों ‘धरा सुता का त्याग’ और ‘एकलव्य’ के प्रकाशन के बाद अब उनका यह नया बालगीत संग्रह ‘भारत की पहचान तिरंगा’ प्रकाशित होने के बाद से ही चर्चाओं में है। खेमाबंदियों और सस्ती पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े बिना उनकी मौन साहित्य साधना पिछले कई दशकों से अनवरत रूप से चलती ही रही है। अब जवाहर पुस्तकालय मथुरा से प्रकाशित होकर उनका नया बाल गीत संग्रह ‘भारत की पहचान तिरंगा’ सुधी पाठकों ‌के हाथों में आने के बाद डॉ. मधुकर के बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व में बेहतरीन बाल गीतों के सर्जक का एक नया आयाम जोड़ने में पूरी तरह से सफल सिद्ध होता दिख रहा है।

इस संग्रह के सभी 36 बालगीत अपनी सरल भाषा-शैली, गेयता, माधुर्य, संवेदनशीलता और विषयों के वैविध्यपूर्ण, सधे हुए, कुशल चयन की दृष्टि से तो लाजवाब हैं ही, साथ ही इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये सभी गीत सोद्देश्य होते हुए भी कहीं भी यह आभास नहीं होने देते कि कोई उम्रदराज कवि बच्चों को देश भक्ति, प्रकृति प्रेम या सद्संस्कारों के कोरे उपदेश दे रहा हो, बल्कि सभी गीत बालमन में गहराई से उतरते हुए बच्चों के बीच बच्चा बनकर ही रचे गए हैं। डॉ. मधुकर ने इस संग्रह के कई गीत अपने पोते-पोतियों और धेवते-धेवतियों के संग खेलते और गाते-गुनगुनाते हुए रचे हैं और वे काव्य शिल्प की दृष्टि से निस्संदेह अनायास ही बहुत ही बेहतरीन और अनूठे बन गए हैं।

इस संग्रह की एक सबसे बड़ी और प्रमुख विशेषता इसका उत्कृष्ट प्रकाशन, व्याकरणीय दृष्टि से त्रुटिरहित शब्द संयोजन और हर गीत के साथ विषय को स्पष्ट करता रेखांकन है जो इसे आकर्षक और संग्रहणीय बनाता है। उमेश शर्मा का आवरण चित्र भी लुभावना और चित्ताकर्षक है।

‘हाथी दादा का स्कूल’ गीत में मधुकर हास्य के साथ ही शिक्षा की महत्ता, नैतिकता, अहिंसा और सत्य, दया, ममत्व जैसे सद्गुणों को बगैर किसी बोझिलता के खेल ही खेल में बच्चों को बड़ी आसानी से समझा देते हैं-
बाघ पढ़ाए गणित शेरनी हिंदी लगी पढ़ाने।
सीधी-सादी गाय लगी नैतिकता को समझाने।

‘गौरैया’ गीत में जब कवि बच्चा बनकर बच्चों की तरह ही गाता है तो बहुत ही सुंदर शब्द चित्र सहज ही बन जाता है-
भूखा पेट भरे जब इसका
नाचेगी तब ता-ता थैया।
अपने घर आई गौरैया।

पड़े सिंह राजा बीमार
आया उनको तेज बुखार-गीत है तो सिर्फ दो बंद का छोटा सा लेकिन जब यह बच्चों के हाथ पड़ता है तो वे इसे खूब मौज-मजे लेते हुए गाते और खेलते हैं, यही कवि के कवि कर्म और कवि धर्म की सार्थकता और उसका सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार भी है।

‘तोता’ शीर्षक गीत भी संग्रह की बेहतरीन रचना है-
दादाजी से बोला पोता,
देखो, कितना सुंदर होता।
रंग हरा पर चोंच लाल है,
यह करता दिन भर कमाल है।
पत्तों में झट से छुप जाता,
उल्टा लटक कभी दिखलाता।

‘दयालु बिटिया’ गीत में कवि ने सभी जीवों के प्रति बालकों की सहज करुणा और संवेदनशीलता को बहुत ही चतुराई और कुशलता से उकेरा है-
श्वान भीगते उसने देखा।
उपजी मन में करुणा रेखा।
उसके ऊपर छतरी तानी।
भूल गई सारी शैतानी।

अंत में कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कवि मधुकर ने संग्रह के अपने सभी 36 बाल गीतों के साथ पूरा न्याय किया है। बच्चे इन्हें खेलते-कूदते हुए आसानी से गा सकते हैं और भारी-भरकम उपदेशों की घुट्टी पिए बगैर ही काम की बातें खेल-खेल में बड़ी आसानी से सीख भी लेते हैं।

*समीक्षक-गणेश ‘पथिक’


पुस्तक समीक्षा-भारत की पहचान तिरंगा (बालगीत संग्रह)
कवि-डॉ. महेश मधुकर

प्रकाशक- जवाहर पुस्तकालय, सदर बाजार, मथुरा
पृष्ठ संख्या-67
प्रथम संस्करण-2024
मूल्य-₹250

डॉ. महेश मधुकर

*

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