कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कवि मधुकर ने संग्रह के अपने सभी 36 बाल गीतों के साथ पूरा न्याय किया है। बच्चे इन्हें खेलते-कूदते हुए आसानी से गा सकते हैं और भारी-भरकम उपदेशों की घुट्टी पिए बगैर ही काम की बातें खेल-खेल में बड़ी आसानी से सीख भी लेते हैं।
इन्हें पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है मानो लेखकों ने बहुत नजदीक से इनकी समस्याओं को देखा हो। आजकल के इस दौर में भला इन पर कौन लिखना चाहता है? मैं इस लघुकथा संग्रह के सभी लेखकों को साधुवाद देता हूं, जिनकी लघुकथाएं सीधे दिल में उतरती हैं और एक चुभन छोड़ देती हैं।