एफएनएन , देहरादून : उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों के उपलब्ध आंकड़ों की तुलना करने पर 2022 के विधानसभा चुनाव के समय दर्ज मतदाताओं और 2026 की सूची के बीच 7,01,311 का अंतर सामने आया है। धर्मपुर, काशीपुर और हल्द्वानी जैसी विधानसभा सीटों पर भी मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर दर्ज किया गया है।
इन आंकड़ों के बाद खास तौर पर उन विधानसभा क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है, जिन्हें मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों के रूप में देखा जाता है। कांग्रेस मतदाता सूची में नामों को लेकर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों पर आपत्ति जताई है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े केवल कुल मतदाता संख्या में अंतर दिखाते हैं। इनसे यह साबित नहीं होता कि कितने मतदाताओं के नाम SIR के दौरान हटाए गए या उनमें से कितने किसी विशेष समुदाय से संबंधित हैं।
चार जिलों में 7 लाख से अधिक मतदाताओं का अंतर
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चार मैदानी और तराई से जुड़े जिलों में 2022 और 2026 की मतदाता संख्या के बीच उल्लेखनीय अंतर दर्ज किया गया है।
देहरादून जिले में 2022 के 14,87,775 मतदाताओं के मुकाबले 2026 की सूची में 11,90,805 मतदाता दर्ज हैं। दोनों आंकड़ों के बीच 2,96,970 का अंतर है।
हरिद्वार में 2022 के 14,20,182 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 12,46,219 मतदाता दर्ज किए गए हैं। यहां अंतर 1,73,963 का है।
ऊधमसिंह नगर में 2022 के 13,03,476 मतदाताओं के मुकाबले 2026 की सूची में 11,55,672 मतदाता हैं। इस तरह दोनों आंकड़ों में 1,47,804 का अंतर है।
वहीं, नैनीताल जिले में 2022 के 7,75,899 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 6,93,325 मतदाता दर्ज हैं। यहां दोनों वर्षों के बीच 82,574 का अंतर है।
चारों जिलों को मिलाकर 2022 में कुल 49,87,332 मतदाता थे, जबकि 2026 की उपलब्ध सूची में इनकी संख्या 42,86,021 बताई गई है। इस तरह कुल अंतर 7,01,311 का है।
धर्मपुर विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा अंतर
देहरादून जिले की धर्मपुर विधानसभा सीट पर दोनों वर्षों के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। 2022 में यहां 2,06,737 मतदाता दर्ज थे, जबकि 2026 की सूची में 1,46,861 मतदाता बताए गए हैं। दोनों के बीच 59,876 का अंतर है।
विकासनगर सीट पर 2022 के 1,07,308 मतदाताओं के मुकाबले 2026 में 99,916 मतदाता दर्ज हैं। यहां अंतर 7,392 का है।
सहसपुर विधानसभा क्षेत्र में 2022 के 1,71,762 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 1,61,174 मतदाता बताए गए हैं। इस तरह दोनों वर्षों के बीच 10,588 का अंतर है।
इन आंकड़ों के चलते देहरादून जिले की इन सीटों पर मतदाता संख्या में हुए बदलाव को लेकर राजनीतिक और चुनावी विश्लेषण किया जा रहा है।
हरिद्वार की कई सीटों पर बदली मतदाता संख्या
हरिद्वार जिले की कई विधानसभा सीटें स्थानीय सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से चर्चा में रहती हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भगवानपुर विधानसभा सीट पर 2022 में 1,23,476 मतदाता थे, जबकि 2026 की सूची में 1,17,044 मतदाता दर्ज हैं। यहां अंतर 6,432 का है।
पिरान कलियर में 2022 के 1,27,118 मतदाताओं के मुकाबले 2026 में 1,16,187 मतदाता हैं। दोनों के बीच 10,931 का अंतर है।
खानपुर में 2022 के 1,47,459 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 1,35,441 मतदाता दर्ज हैं। यहां अंतर 12,018 का है।
मंगलौर में 2022 के 1,15,978 मतदाताओं के मुकाबले 2026 की सूची में 1,07,424 मतदाता हैं। दोनों आंकड़ों के बीच 8,554 का अंतर है।
झबरेड़ा विधानसभा क्षेत्र में 2022 के 1,21,491 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 1,14,015 मतदाता दर्ज हैं। यहां 7,476 का अंतर सामने आया है।
काशीपुर और जसपुर में भी मतदाता संख्या में अंतर
ऊधमसिंह नगर जिले की काशीपुर विधानसभा सीट पर 2022 में 1,76,740 मतदाता दर्ज थे। 2026 की उपलब्ध सूची में यह संख्या 1,34,989 बताई गई है। दोनों के बीच 41,751 का अंतर है।
जसपुर सीट पर 2022 के 1,32,654 मतदाताओं के मुकाबले 2026 में 1,17,401 मतदाता दर्ज हैं। इस तरह यहां 15,253 का अंतर सामने आया है।
काशीपुर में मतदाता संख्या का यह अंतर राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, इसकी वजहों को स्पष्ट करने के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने और स्थानांतरण से संबंधित विस्तृत आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी होगा।
हल्द्वानी और रामनगर के आंकड़ों पर भी नजर
नैनीताल जिले की हल्द्वानी विधानसभा सीट पर 2022 में 1,51,396 मतदाता थे, जबकि 2026 की सूची में 1,19,332 मतदाता दर्ज हैं। दोनों वर्षों के बीच 32,064 का अंतर है।
रामनगर में 2022 के 1,21,868 मतदाताओं की तुलना में 2026 में 1,10,837 मतदाता बताए गए हैं। यहां अंतर 11,031 का है।
कालाढूंगी विधानसभा सीट पर 2022 के 1,71,639 मतदाताओं के मुकाबले 2026 की सूची में 1,62,882 मतदाता दर्ज हैं। दोनों आंकड़ों के बीच 8,757 का अंतर है।
मतदाता सूची के बदलाव पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
SIR के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी का आरोप है कि उसके परंपरागत समर्थन वाले क्षेत्रों में भी मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर भी कांग्रेस ने चिंता जताई है।
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अमरेंद्र बिष्ट के अनुसार, पार्टी की सक्रियता के आधार पर जिस तरह की स्थिति की आशंका थी, उसके मुकाबले इन सीटों पर मतदाताओं की संख्या में बदलाव कम दिखाई दिया है। इसके बावजूद पार्टी इन आंकड़ों के संभावित चुनावी प्रभाव का आकलन कर रही है।
कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में हुए बदलाव की निष्पक्ष जांच और वास्तविक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों पर जताई आपत्ति
दूसरी ओर, भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों पर आपत्ति जताई है। भाजपा के प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार ने कहा कि कांग्रेस एक विशेष वर्ग के मतदाताओं पर अधिक ध्यान देती है, जबकि भाजपा पारदर्शी राजनीति के आधार पर चुनाव में उतरती है।
भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर भ्रम फैलाने के बजाय तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। पार्टी आगामी चुनाव की तैयारियों में जुटी है।
क्या 2027 के चुनाव पर पड़ेगा असर?
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में हुए बदलाव राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं। हालांकि, केवल मतदाताओं की कुल संख्या में अंतर के आधार पर किसी सीट के चुनावी परिणाम का आकलन नहीं किया जा सकता।
चुनावी नतीजों पर मतदान प्रतिशत, नए मतदाताओं का पंजीकरण, उम्मीदवारों की स्थिति, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं के मतदान व्यवहार जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।
इसके अलावा, 2022 और 2026 की मतदाता संख्या के बीच का अंतर अपने आप में SIR के दौरान हटाए गए नामों की संख्या नहीं है। दोनों वर्षों के बीच नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण और अन्य कारणों से भी मतदाता सूची में बदलाव हो सकता है।
इसी तरह, कुल मतदाता संख्या से यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि किसी विशेष समुदाय के कितने नाम हटे या जुड़े हैं। इसके लिए आधिकारिक और समुदायवार प्रमाणित आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
फिलहाल उपलब्ध आंकड़े चार जिलों और चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या के अंतर को सामने रखते हैं। आगामी चुनाव से पहले इन बदलावों पर राजनीतिक दलों की नजर बनी रहेगी, लेकिन इनके वास्तविक कारणों और चुनावी प्रभाव को समझने के लिए विस्तृत आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी होगा।








