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निवेशकों को 10% रिटर्न का झांसा, बिटकॉइन घोटाले में दो भाई गिरफ्तार

एफएनएन, नई दिल्ली : सीबीआई ने ₹20,000 करोड़ के गेन बिटकॉइन क्रिप्टो घोटाले में डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी के मुताबिक, डार्विन लैब्स ने उस डिजिटल ढांचे को तैयार किया था, जिस पर कथित तौर पर चल रहे गेन बिटकॉइन घोटाले की पूरी तकनीकी प्रणाली आधारित थी। आइए पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।

केंद्रीय जांच ब्यूरो ने लगभग ₹20,000 करोड़ के बहुचर्चित गेन बिटकॉइन क्रिप्टोकरेंसी घोटाले में बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक आयुष वार्ष्णेय को गिरफ्तार कर लिया है। अधिकारियों ने बुधवार को इसकी जानकारी दी।

सीबीआई के अनुसार, वार्ष्णेय इस मामले के मुख्य आरोपियों में शामिल हैं। एजेंसी ने उनके खिलाफ पहले ही लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी कर रखा था। सोमवार को जब वह देश छोड़कर भागने की कोशिश कर रहे थे, तब मुंबई एयरपोर्ट पर अलर्ट जारी होने के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। इसके बाद मंगलवार को उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।

जांच में क्या आया सामने?

जांच एजेंसी के मुताबिक, डार्विन लैब्स ने उस डिजिटल ढांचे को तैयार किया था, जिस पर कथित तौर पर चल रहे गेन बिटकॉइन घोटाले की पूरी तकनीकी प्रणाली आधारित थी। जांच में डार्विन लैब्स  प्राइवेट लिमिटेड और इसके सह-संस्थापकों आयुष वार्ष्णेय, साहिल बघला और निकुंज जैन की भूमिका सामने आई है। निकुंज जैन वर्तमान में वाओमी एआई के फाउंडर और चीफ कैपिटल ऑफिसर भी हैं।

सीबीआई का आरोप है कि इन लोगों ने मिलकर एमसीएपी नामक क्रिप्टो टोकन और उससे जुड़े ERC-20 स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को डिजाइन और विकसित किया था, जिसका इस्तेमाल इस कथित क्रिप्टो पोंजी स्कीम में किया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि डार्विन लैब्स ने कई महत्वपूर्ण डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए थे, जिनमें GBMiners.com नामक बिटकॉइन माइनिंग पूल प्लेटफॉर्म, बिटकॉइन पेमेंट गेटवे, कॉइन बैंक बिटकॉइन वॉलेट और गेन बिटकॉइन वेबसाइट शामिल हैं। इन प्लेटफॉर्म के जरिए निवेशकों से संपर्क और निवेश कराया जाता था।

कब और कैसे हुआ पूरा घोटाला?

यह घोटाला वर्ष 2015 में गेन बिटकॉइन नाम से शुरू हुआ था, जिसे कथित तौर पर वेरिएबलटेक प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर संचालित किया जा रहा था। जांच एजेंसी के मुताबिक इस योजना का मास्टरमाइंड अमित भारद्वाज (अब मृत) और उसका भाई अजय भारद्वाज थे।

इस योजना में निवेशकों को 18 महीने तक हर महीने 10% तक बिटकॉइन रिटर्न देने का लालच दिया जाता था। लोगों को बाहरी एक्सचेंज से बिटकॉइन खरीदकर गेन बिटकॉइन में तथाकथित क्लाउड माइनिंग कॉन्ट्रैक्ट के जरिए जमा करने के लिए कहा जाता था।

सीबीआई के अनुसार यह मॉडल मल्टी-लेवल मार्केटिंग (MLM) पर आधारित पोंजी स्कीम था, जिसमें पुराने निवेशकों को भुगतान नए निवेशकों से आने वाले पैसे से किया जाता था। शुरुआती दौर में बिटकॉइन में भुगतान होने से लोगों को यह योजना लाभदायक लगने लगी।

लेकिन 2017 के बाद जब नए निवेशकों का प्रवाह कम हुआ, तो कंपनी ने अचानक भुगतान बिटकॉइन के बजाय अपने ही बनाए क्रिप्टो टोकन MCAP में करना शुरू कर दिया, जिसकी कीमत बिटकॉइन से काफी कम थी। इससे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ।

कई एफआईआर हुए दर्ज

इस बड़े घोटाले के चलते जम्मू-कश्मीर से महाराष्ट्र और दिल्ली से पश्चिम बंगाल तक कई एफआईआर दर्ज की गई थीं। मामले की व्यापकता और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी।

सीबीआई अब पूरे घोटाले की परतें खोलने, इसमें शामिल सभी लोगों की पहचान करने और निवेशकों से हड़पे गए धन का पता लगाने के लिए जांच आगे बढ़ा रही है, जिसमें विदेशों में भेजे गए फंड का भी पता लगाया जा रहा है।

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