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विदेशी मीडिया में छाया नैनीताल का ‘मास गार्डन’

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एफएनएन, नैनीताल। लिंगाधार में हाल ही में स्थापित ‘मास गार्डन’ (हरिता का बगीचा) अपने लोकार्पण के साथ ही देश-दुनिया के मीडिया की सुर्खियों में आ गया है। जल संरक्षण के लिए बनाए गए देश के इस पहले मास गार्डन का बीते शुक्रवार को ही जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने शुभारंभ किया है।

मास गार्डन के लोकार्पण के समाचार को एएनआई के साथ ही रूस, जर्मनी, स्वीडन, अमेरिका, अबुधाबी और क्वालालांपुर के प्रमुख मीडिया घरानों ने विस्तृत कवरेज दी है। लिहाजा यह वानस्पतिक बगीचा देश-विदेश में लाखों-करोड़ों प्रकृति प्रेमियों की प्रशंसा बटोर रहा है। इससे पहले फिनलैंड की बायो एकेडमी ने भी जुलाई में वन अनुसंधान केंद्र द्वारा हल्द्वानी में विकसित किए गए बायो डायवर्सिटी पार्क की भी काफी प्रशंसा की थी।

‘मास गार्डन’ की खूबियां

मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी के अनुसार, नैनीताल के सड़ियाताल क्षेत्र में यह गार्डन करीब 10 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित किया गया है। यहां मास की 28 और लीवर वट की पांच प्रजातियां संरक्षित की गई हैं। गार्डन में 1.2 किमी लंबी मास ट्रेल भी बनाई गई है, जिसमें इसकी तमाम प्रजातियों को प्रदर्शित करने के साथ ही उनसे संबंधित जानकारियां भी विस्तार से इंटरेस्टिंग स्टाइल में समझाई गई हैं। गार्डन में एक सूचना केंद्र भी स्थापित किया गया है, इसमें प्रथम विश्व युद्ध की एक पेटिंग प्रकृति प्रेमियों-पर्यटकों को खास तौर पर लुभाती है। इस पेंटिंग में घायल सैनिकों के उपचार में मास का इस्तेमाल होते दिखाया गया है।

आकर्षित करते हैं मास के बने आभूषण भी 

सूचना केंद्र में मास के बने आभूषण विशेष आकर्षण के केंद्र हैं। जापान में इस प्रकार के आभूषण खासे लोकप्रिय हैं, सूचना केंद्र के लिए इसको अनुसंधान केंद्र की जेआरएफ स्कालर तनुजा पांडे ने विकसित किया है। गार्डन में डायनासोर का माडल बनाकर मास के जुरासिक युग से ही पृथ्वी पर मौजूदगी की जानकारी दी गई है। इसके अतिरिक्त मास की प्रजातियों के जीवाणु एवं कीटाणुरोधी गुणों और वायु प्रदूषण की संकेतक प्रजाति के रूप में उनके उपयोग के भी माडल दर्शाए गए हैं।

क्या है मास?

मास ब्रायोफाइटा वर्ग का अपुष्पक पौधा है। आमभाषा में इसे हरिता कहते हैं। यह एक से दस सेमी लंबा होता है। यह बिना जड़ का पौधा है और छायादार और नम जगहों पर समूहों में उगता है। दुनिया में इसकी 1200 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।

 

 

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