Friday, April 10, 2026
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Homeआस्थामर्यादामय जीवन जीने की कला सिखाती है श्रीरामकथा

मर्यादामय जीवन जीने की कला सिखाती है श्रीरामकथा

खिरका जगतपुर में संगीतमय साप्ताहिक श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ के पंचम दिवस में भी आचार्य अवध किशोर शास्त्री के श्रीमुख से खूब बही भक्ति-ज्ञान-वैराग्य की मंदाकिनी

फ्रंट न्यूज नेटवर्क, फतेहगंज पश्चिमी-बरेली। ग्राम खिरका जगतपुर में चल रही संगीतमय साप्ताहिक श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ के पांचवें दिन गुरुवार को नैमिष धाम से आए कथाव्यास आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ ने मध्याह्न और सायंकालीन सत्र में क्रमश: परशराम-लक्ष्मण संवाद, सीता-राम विवाह, श्रीराम के राजतिलक की तैयारियां, मंथरा के पूर्व जन्म की कथा, राम वनवास, केवट की भक्ति आदि प्रेरक प्रसंगों का संगीतमय, सरस गायन किया और मानव जीवन में श्रीराम की भक्ति की महत्ता को विस्तार से समझाया।

मटरूलाल लालीदेवी चैरिटेबिल ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी सूबेदार मेजर वीरेंद्र पाल सिंह (सेवानिवृत्त) के आयोजकत्व और नत्थूलाल गंगवार पुजेरी के मुख्य यजमानत्व में आयोजित इस अनुष्ठान में कथाव्यास ‘सरस’ जी ने भारी तादाद में उमड़े महिला-पुरुष-बालक श्रद्धालुओं को समझाया कि रामचरित मानस मर्यादाओं में रहकर जीवन को उच्च आदर्शों और मर्यादाओं में जीने का सलीका सदियों से सिखाता रहा है।

बताया-आज जब संपत्ति के लिए भाई-भाई का खून बहा देने में भी संकोच नहीं करता, वहीं श्रीराम अपने राज्याभिषेक की सूचना पर पूछते हैं कि जब चारों भाइयों के नामकरण, विद्यार्जन, विवाह जैसे सारे संस्कार एक साथ ही हुए तो राज्याभिषेक सिर्फ मुझ अकेले का क्यों किया जा रहा है?

पति के साथ वनगमन की अनुमति लेने आईं सीता अपनी सास से रो-रोकर कहती हैं कि मैं कितनी अभागिन हूं जिसे सासू मां की सेवा के सौभाग्य से वंचित होना पड़ेगा। कथाव्यास बताते हैं-भगवान धन-वैभव के प्रदर्शन से नहीं रीझते, बल्कि वे तो भाव के भूखे हैं।

कथा समारोह के सफल आ़योजन में हरदयाल गंगवार, अरविंद गंगवार, पूर्व प्रधान कृष्ण पाल गंगवार, दिनेश गंगवार, शिवम गंगवार आदि ग्रामवासी भी रात-दिन सहयोग कर रहे हैं।

भिटौरा से आए सपा नेत्री राधा सोमवंशी, विद्यालय प्रबंधक-समाजसेवी राजीव मिश्रा और उनके साथी तथा गणेश ‘पथिक’, बनवारीलाल यदुवंशी, अशोक रस्तोगी, ओमेंद्र पाल, रवींद्र, मोहन स्वरूप, अन्नू, प्रेमपाल गंगवार, नरेश गंगवार समेत भारी तादाद में गांव और आसपास के महिला-पुरुष, बालक सम्मिलित हुए। आरती-प्रसाद वितरण और भजन-कीर्तन के उपरांत कथा को विश्राम दिया गया।

 

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