एफएनएन, देहरादून : RTI Act 20 Years सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू हुए दो दशक से अधिक समय बीत चुका है। इस कानून ने आम नागरिकों को सरकारी कामकाज से जुड़ी जानकारी हासिल करने का कानूनी अधिकार दिया और लोकतंत्र में उनकी भागीदारी को मजबूत किया। हालांकि, समय के साथ आरटीआई के दुरुपयोग को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
उत्तराखंड सूचना आयोग की मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने आरटीआई कानून के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए इसे और अधिक प्रभावी एवं जनोपयोगी बनाने के लिए कुछ सुधारों की आवश्यकता बताई।
राशन कार्ड से मनरेगा तक, आम आदमी के काम आया RTI
राधा रतूड़ी के मुताबिक, आरटीआई कानून आम नागरिकों के लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ है। लोग राशन कार्ड, एफआईआर की कॉपी, स्थानांतरण पत्र, पहचान पत्र और गांव में मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत हुए कार्यों की जानकारी हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
उनका कहना है कि इस कानून ने सरकारी अधिकारियों के सामने आम नागरिक के अधिकार को मजबूत किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया है।
छोटी जानकारी के लिए RTI लगाना व्यवस्था पर सवाल
मुख्य सूचना आयुक्त ने यह भी माना कि यदि किसी व्यक्ति को पेंशन, राशन, स्थानांतरण पत्र या वोटर कार्ड जैसी सामान्य सेवाओं के लिए आरटीआई का सहारा लेना पड़े, तो यह सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उनके अनुसार, अधिकारियों को यह समझना होगा कि सरकारी पद जनता पर शासन करने के लिए नहीं बल्कि उनकी सेवा करने के लिए हैं। उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद पुरानी मानसिकता को भी ऐसी समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताया।
विभागों के मैनुअल सार्वजनिक होने से घट सकता है RTI का बोझ
राधा रतूड़ी ने कहा कि कई सार्वजनिक उपक्रम और सरकारी विभाग अब तक अपने कामकाज से संबंधित मैनुअल जनता के लिए उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। अगर विभाग अपने नियम, प्रक्रियाएं और जिम्मेदारियां सार्वजनिक करें तो इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
उनका मानना है कि जानकारी पहले से सार्वजनिक होने पर कई मामलों में लोगों को आरटीआई दाखिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इससे विभागीय कामकाज में कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने में भी मदद मिलेगी।
आदेश न मानने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई का अधिकार
सूचना आयोग के पास अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सीमित शक्ति होने की बात पर राधा रतूड़ी ने इसे पूरी तरह सही नहीं माना। उन्होंने बताया कि लापरवाही बरतने या आयोग के आदेश का पालन नहीं करने वाले अधिकारियों पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
इसके अलावा अधिकारियों को नोटिस जारी करने और विभागीय कार्रवाई की संस्तुति करने का भी अधिकार आयोग के पास है। उनके मुताबिक, कई बार सिर्फ नोटिस जारी होने से ही अधिकारी लंबित मामलों का समाधान करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग का उद्देश्य अधिकारियों को दंडित करना नहीं, बल्कि आम नागरिक का काम करवाना है।
RTI के दुरुपयोग पर भी चिंता
आरटीआई कानून के दुरुपयोग को लेकर उठ रहे सवालों पर मुख्य सूचना आयुक्त ने माना कि कुछ लोग इसे दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके मुताबिक, कुछ मामलों में एक ही जानकारी को अलग-अलग तरीकों से बार-बार मांगा जाता है।
ऐसी स्थिति में लोक सूचना अधिकारियों का काफी समय एक ही तरह की जानकारी उपलब्ध कराने में खर्च हो जाता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को आरटीआई कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक संशोधनों पर विचार करना चाहिए।
पारदर्शिता और जवाबदेही के बीच संतुलन जरूरी
आरटीआई कानून ने पिछले दो दशकों में आम नागरिक को सरकारी व्यवस्था से सवाल पूछने की ताकत दी है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकारी विभाग अधिक से अधिक सूचनाएं स्वतः सार्वजनिक करें, ताकि छोटी-छोटी जानकारियों के लिए लोगों को आरटीआई का सहारा न लेना पड़े।
साथ ही, कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए उचित व्यवस्था और सुधार किए जाएं, जिससे आरटीआई की मूल भावना—पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तिकरण—मजबूत बनी रहे।








