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काशीपुर के सिंघाड़े की कचरी का स्वाद चख रहा महाराष्ट्र

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एफ़एनएन, काशीपुर : नगर की शान गिरीताल सरोवर जहां पहले नौका विहार व अपने सुंदरता के चलते जाना जाता था, आज उसकी शान सिंघाड़ा बन चुका है। आलम यह है कि यहां का सिंघाड़ा महाराष्ट्र के साथ ही कई अन्य राज्यों के लोगों की जुबान पर राज करता है। खास बात यह है कि जहां सीजन में यह सिंघाड़ा जितना बिकता है उससे कहीं अधिक सिंघाड़ा इसके बाद नबंवर में अधिक प्रयोग किया जाता है। कारण, बचा हुआ सिंघाड़ा कचरी बनाने के काम में आता है। जो कि स्वाद में भरपूर होता है। यह बात दीगर है कि तिकोने आकार यह फल सितंबर और अक्टूबर में फल का रूप लेता है। व्रत उपवास में भी सिंघाड़े को फलाहार में शामिल किया जाता है। इसकी बर्फी, हलुआ और मिठाई भी बनती है जो पोष्टिकता से भरपूर होती है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, बिटामिन बी व सी, फास्फोरस, मैग्नीशियम, आयरन जेसे मिनरल, रायबोप्लेबिन जैसे तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। आयुर्वेद में कहा गया है कि सिंघाड़े में भैंस के दूध की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक खनिज लवण और क्षार के तत्व पाए जाते हैं।

कैसे होता है सिंघाड़ा

सिंघाड़े की खेती करने के लिए बेल लगाई जाती है। जो धीरे-धीरे पानी और नमी के चलते सिंघाड़े जैसा फल बनता है। इसके पक जाने के बाद सिंघाड़ा तोड़ा जाता है। यह भी एक जोखिम भरा होता है क्योंकि इसमें दलदल अधिक होती है। ऐसे में टायर बांधकर यह लोग सिंघाड़ा तोड़ते हैं। इसके बाद इसको एकत्र कर साफ किया जाता है। मौजूदा समय में काशीपुर में 14 से 15 मजदूर ठेकेदार के अंडर में काम कर रहे हैं।

12-13 कुंतल जाता है बाहर

रोजाना सिंघाड़े को तोड़कर मंडी में भेजा जाता है। इसके लिए रोज के हिसाब से 12-13 कुंतल सिंघाड़ा बाहर जाता है और कई राज्यों में बेचा जाता है। जिसके बाद इसका प्रयोग साग-सब्जी और अन्य चीजों में प्रयोग किया जाता है। ठेकेदार का कहना है कि इसमें नबंवर के बाद अधिक मुनाफा हो जाता है।

कचरी का स्वाद लाजबाव

सिंघाड़े को मंडी में देने के बाद शेष बचे पक चुके सिंघाड़े की कचरी बनाई जाती है जो लोगों की काशीपुर में पहली पसंद बन चुकी है। खासतौर पर महाराष्ट्र के लोगों की यह फेवरेट डिश है। यह 400 से 500 रुपये तक इसकी कचरी बिकती है। इसको मंडी से लोग यूपी के मुरादाबाद से लेकर अन्य कई जिलों में भी जाता है। जहां यह उचित दामों में बिकता है।

डेढ़ लाख का हुआ था ठेका

ठेकेदार का कहना है कि इस बार हिंदी प्रेम सभा से इसका ठेका करीब डेढ़ लाख रुपये का हुआ था। जिसका उनकाे अच्छा मुनाफा हो जाता है। यह पहले मंडी तक जाता है। मंडी से इसकी बिक्री होती है।

कमल की होती थी खेती

सिंघाड़े की खेती से बहुत पहले यहां पर कमल के फूल की खेती होती है। जिसमें तली में भसिंडा भी उगता है। जिसको भी मंडी में बेंचा जाता था और इसकी तरह खरीद-फरोख्त होती थी, लेकिन अब सिर्फ यहां पर सिंघाड़े की खेती ही हो पाती है। जिसको मछुआरे दलदल में घुसकर सिंघाड़ा निकालते हैं।

आठ से नौ रुपये किलो बिकता

सिंघाड़ा मंडी में जाने के बाद आठ से नौ रुपये किलो तक बिक जाता है। इससे पहले मौसम की शुरूआत में यह 35-40 रुपये किलो तक बिकता है। जिससे अच्छा मुनाफा हो जाता है, लेकिन आसपास की गंदगी इसमें थोड़ी दिक्कत अाती है। आसपास से छोड़ा जाने वाला पानी इसको प्रभावित करता है।

दवा और दुआओं में आता याद

सिंघाड़ा दवा और दुआओं दोनो में याद किया जाता है। सिंघाड़ा अस्थमा और बवासीर जैसी बीमारियों की अचूक दवा भी है और छठ पर्व पर महिलाएं अपने सुहाग के लिए इसे फल के रूप में भी प्रयोग करती है। इस वक्त छठ के पर्व पर भी इसकी बिक्री अधिक से अधिक होती है।

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