Wednesday, March 4, 2026
03
20x12krishanhospitalrudrapur
IMG-20260201-WA0004
previous arrow
next arrow
Shadow
Homeबुद्धिजीवियों का कोनाकुली बेगार प्रथा के सौ साल

कुली बेगार प्रथा के सौ साल

वक़्त  मुट्ठी में रखे हुए रेत की तरह फिसलता ही जाता है. अगर कोई चीज पीछे रह जाती है तो वह है उससे जुड़ी स्मृतियां,यादें।
सौ साल पहले जब देश गुलामी की ज़ंज़ीरों से जकड़ा हुआ था, चारो तरफ से आज़ादी के नारे गगन में गूंज रहे थे,यूनियन जेट के झंडे के तहत ब्रिटिश हुकूमत हम पर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए शासन कर रही थी। हम सब अपनी -अपनी सामर्थ्य के हिसाब से इसे लड़ रहे थे।
सन 1821 में मकर संक्रांति के अवसर पर एतिहासिक संकल्प लेते हुए सरयू बगड़ , बागेश्वर, उत्तराखंड में कुली बेगार के रजिस्टर पवित्र सरयू नदी में बहा दिए थे। इस ऐतिहासिक घटना से देशव्यापी स्वंतंत्रता संग्राम आंदोलन को बल मिला और आंग्ल शासन की चूलें हिल गयी। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी ने इस ऐतिहासिक कुली बेगार प्रथा के अंत के बाद वर्ष 1929 में बागेश्वर तक की यात्रा कर महान आंदोलन कारियो की सराहना की और आज़ादी के आंदोलन में कुली बेगार प्रथा के अंत को आंग्ल शासन के समापन की शुरुआत बताया।
सौ साल पूरे होने पर आज नगर वासियों को जान-जागृति व महान जन-क्रांति का शताब्दी वर्ष मनाने का सौभाग्य मिला।
कुली बेगार प्रथा एक जघन्य सामंतवादी व साम्राज्यवादी व्यस्था की परिचायक प्रथा थी,जिसमें अंग्रेज़ी हुक्कमरान के इलाकाई दौर में उनके लाव-लस्कर की सम्पूर्ण व्यव्स्था पधानो व थोकदारों को करनी पड़ती थी, जिसके लिए एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक उनके सामान को पहुचाने के लिए निःशुल्क कुली के रूप में गांव वालों की बारी लगती थी, जिसके लिए पधानो के पास कुली बेगार का रजिस्टर होता था। यह उसी प्रकार की कुव्यवस्था थी जिस प्रकार अमेरिका में दास प्रथा प्रचलित रही।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने जिस प्रकार दास प्रथा का अन्त किया उसी प्रकार अंग्रेज़ों की कुली बेगार प्रथा को कुमाऊ केशरी पं बद्री दत्त पांडे जी आदि स्वंतंत्रता संग्राम सेनानियों के नेतृत्व में बागेश्वर की जनता के साथ हमेशा -हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। उसी कुली बेगार प्रथा के समापन की महान शताब्दी वर्ष पर हम सब लोगो को वैश्विक महामारी कोविड- 19 की समाप्ति के लिए भी संकल्प लेना है।और शासन -प्रशासन द्वारा निर्धारित मानकों का अनुपालन कर स्वयं को इस संसार की महामारी से बचना है। इतिहास का पन्नो के झरोखों से जिस प्रकार हम आज कुली बेगार प्रथा के अंत के सौ साल पूरे होने की खुशी मना रहे है उसी प्रकार सामूहिक बचाव के तरीकों को अपनाकर हम आने वाले सालों में कोरोना महामारी पर जीत का जश्न भी जरूर मनाएंगे।

प्रेम प्रकाश उपाध्याय ‘नेचुरल’,
बागेश्वर, उत्तराखंड

 

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments