
एफएनएन, देहरादून: उत्तराखंड में सूचना का अधिकार (RIGHT TO INFORMATION) अधिनियम के तहत एक अहम फैसला लिया गया है. उत्तराखंड सूचना आयोग ने अधीनस्थ न्यायपालिका से जुड़े अधिकारियों और न्यायाधीशों के खिलाफ दर्ज शिकायतों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. देश में ऐसा पहली बार होगा, जब ऐसी जानकारी सार्वजनिक होगी. यह आदेश सूचना आयोग की मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी की अध्यक्षता में पारित किया गया.
मामला अपील संख्या 43293/2025-26 से जुड़ा है, जिसे आईएफएस संजीव चतुर्वेदी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 19(3) के तहत दायर किया था. अपील में अधीनस्थ न्यायपालिका से संबंधित नियमों, शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी. ये अपील और आदेश, देश में एक नजीर पेश कर सकता है.
क्या थी अपीलकर्ता की मांग: अपीलकर्ता द्वारा 14 मई 2025 को दायर आरटीआई आवेदन में चार बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई थी. इसमें उत्तराखंड की अधीनस्थ न्यायपालिका पर लागू सेवा नियम, आचरण नियम और अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शामिल थी. इसके अलावा न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार या अन्य प्रकार के मामले से जुड़ी शिकायतें कहां और कैसे दर्ज की जाती हैं, इसकी जानकारी भी मांगी गई थी.
आरटीआई में यह भी पूछा गया था कि 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों और न्यायाधीशों के खिलाफ कुल कितनी शिकायतें दर्ज हुईं और इनमें से कितने मामलों में अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई या अमल में लाई गई. साथ ही आरटीआई आवेदन की प्रक्रिया के दौरान तैयार की गई फाइल नोटिंग और दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई थीं.
लोक सूचना अधिकारी का पक्ष: लोक सूचना अधिकारी नैनीताल हाईकोर्ट की ओर से अपीलकर्ता को पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई. अधिकारी ने अपने जवाब में कहा कि मांगी गई सूचना गोपनीय प्रकृति की है और तीसरे पक्ष से संबंधित है. इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि इस तरह की जानकारी देने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक होता है. इस जवाब से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने रजिस्ट्रार उच्च न्यायालय नैनीताल के समक्ष पहले विभागीय अपील दायर की, और फिर द्वितीय अपील सूचना आयोग में दायर की. संजीव चतुर्वेदी की अपील के बाद ये निर्देश जारी किया गया.
सूचना आयोग में क्या हुआ: सूचना आयोग में हुई सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता और लोक सूचना अधिकारी दोनों पक्ष मौजूद हुए. अपीलकर्ता ने आयोग के समक्ष दलील दी कि शिकायतों की संख्या और उनके निस्तारण की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित में है और इसे गोपनीय नहीं माना जा सकता. वहीं लोक सूचना अधिकारी ने दोहराया कि शिकायतें न्यायिक अधिकारियों से जुड़ी होने के कारण संवेदनशील हैं और इन्हें बिना अनुमति सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.
सूचना आयोग का अहम फैसला: दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सूचना आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि केवल यह कहना कि सूचना गोपनीय है, सूचना न देने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता. आयोग ने माना कि अधीनस्थ न्यायपालिका में शिकायतों की संख्या और उनके निस्तारण की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पारदर्शिता के दायरे में आती है.हालांकि, आयोग ने यह भी साफ किया कि किसी भी न्यायाधीश या अधिकारी की व्यक्तिगत पहचान या नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा.आयोग ने निर्देश दिए कि शिकायतों की संख्या और प्रक्रिया से संबंधित जानकारी देने से पहले सक्षम स्तर से आवश्यक अनुमति प्राप्त की जाए.
एक महीने के भीतर जानकारी देने के निर्देश: सूचना आयोग ने लोक सूचना अधिकारी को निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी (अधीनस्थ न्यायालय) से अनुमति प्राप्त करने के बाद एक माह के भीतर अपीलकर्ता को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अनुमति नहीं मिलती, तब तक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार माना जाएगा.
क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश: जानकारों का मानना है कि यह आदेश न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है. इससे यह स्पष्ट होगा कि अधीनस्थ न्यायपालिका में शिकायतों की निगरानी किस तरह होती है और उन पर कार्रवाई की प्रक्रिया क्या है? साथ ही यह आदेश भविष्य में आरटीआई के माध्यम से न्यायिक प्रशासन से जुड़ी जानकारी मांगने वाले लोगों के लिए एक नजीर भी बनेगा.





