Tuesday, April 14, 2026
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Homeराज्यउत्तर प्रदेश"जिनके कंधों पर देखे थे मेले कभी...!"

“जिनके कंधों पर देखे थे मेले कभी…!”

गांधीवादी विचारक गांधीमोहन सक्सेना ने अपने पूज्य स्वर्गीय माता-पिता की पावन स्मृति में कराया 25वां वार्षिक सारस्वत अनुष्ठान

कवि गोष्ठी आयोजन समिति और सर्वोदय समाज के संयुक्त तत्वावधान में इंदिरा नगर स्थित आवास पर हुई सरस-सफल-यादगार काव्य गोष्ठी

फ्रंट न्यूज नेटवर्क ब्यूरो, बरेली । कवि गोष्ठी आयोजन समिति एवं सर्वोदय समाज, बरेली के संयुक्त तत्वावधान में  इंदिरा नगर, बरेली में समाजसेवी गांधी मोहन सक्सेना के संयोजन में उनके पिता स्वर्गीय कुॅंवर बनवीर बहादुर एवं माता स्वर्गीया सुखरानी कुॅंवर की पावन स्मृति में सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया

समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार रणधीर प्रसाद गौड़ 'धीर' ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि साहित्यकार-पत्रकार गणेश पथिक एवं विशिष्ट अतिथि मशहूर शायर राम कुमार भारद्वाज ‘अफरोज रहे।

मंचासीन अतिथियों द्वारा माँ शारदे और कुंवर बनवीर बहादुर-सुखरानी कुंवर के चित्रों पर माल्यार्पण-दीप प्रज्ज्वलन एवं मोहन चंद पांडेय 'मनुज' द्वारा माॅं वाणी के लयबद्ध-भावभरे वंदनागीत के सुंदर प्रस्तुतीकरण से कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

सरस काव्य गोष्ठी में अधिकांश कवियों ने माता-पिता की महिमा और उनके सम्मान को बखानती अपनी एक से बढ़कर एक रचनाऍं प्रस्तुत कर देर शाम तक समां बाॅंधे रखा।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्थाध्यक्ष रणधीर गौड़ ‘धीर’ ने श्रीराम वन्दना और माता-पिता के गुणगान से समृद्ध काव्यपाठ करने के साथ ही संयोजक गाँधीमोहन जी की मातृ-पितृ भक्ति और दोनों की पावन स्मृति में विगत 25 वर्ष से हर साल कराए जा रहे इस सारस्वत अनुष्ठान की दिल खोलकर प्रशंसा की। विशिष्ट अतिथि हिंदी ग़ज़लकार रामकुमार भारद्वाज अफरोज़ ने भी अपनी चुटीली-चुभती-संदेशप्रद ग़ज़ल से सदन का दिल जीत लिया।

‘साहित्य सुरभि’ के अध्यक्ष रामकुमार कोली ने पिता की महिमा इस छंद में बखानी और खूब तालियां, जमकर वाहवाही बटोरी-

पिता पथ दर्शक-सृजक भविष्य का भी
इसीलिए पितृ ऋण चुकाना महान है।
चाहरदीवारी-छत-छप्पर-घरौंदा पिता,
पिता को चिंता की चिता से बचाना शान है।

चर्चित कवयित्री पुष्पा गंगवार ‘पूनम’ ने उत्कृष्ट मुक्तक और बेहतरीन ग़ज़ल सुनाई और खूब वाहवाही, जमकर तालियां बटोरीं-

बेवजह फूल को मत हटाया करो-
प्रेमियों बाल में मत सजाया करो,
पुष्प अपनी अपेक्षा कहे इस तरह-
राह में सैनिकों के बिछाया करो।

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इस दौर में सीता को बचाना नहीं आसान
रावण को हराने के लिए राम नहीं हैं।

है इसमें तबियत के तवाजुन का भी किरदार,
पूनम ये खरीदा हुआ आराम नहीं है।

इस भावपूर्ण किंतु विचारोत्तेजक काव्य गोष्ठी में कवयित्री-चिंतक डॉ. सुचित्रा डे ने विचारोत्तेजक काव्यपाठ के साथ ही अपनी समृद्ध विरासत को गुमनामियों में गंवाते और पर्यावरण पर मंडराते भयावह संकट से जूझते अपने शहर की बड़ी चिंताएं भी साझा कीं।

संस्था के सचिव-सुकवि उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट ने अपने स्वर्गस्थ पिता जन कवि ज्ञानस्वरूप ‘कुमुद’ जी को समर्पित उन्हीं का लोकप्रिय गीत और अपना भी चर्चित गीत सुनाकर खूब वाहवाही और भरपूर तालियां बटोरीं।

एक विवशता शब्द तुम्हारा, अधर- अधर पर गीत हमारे।
मुझको ही समझाते हैं सब, लिखे पत्र क्यों बिना विचारे ।।
भावुक मन पर चाबुक था कब?, उलझा यह मन अगर- मगर में।
जाने कितनी उठीं अंगुलियां, मुझ पर मेरे महानगर में।।

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श्वेत कबूतर राज भवन के
दिखा रहे हैं सपने झूठे।
उसकी यह आवाज दबाते
जो फरियादी इनसे रूठे।

मुख्य अतिथि कवि-पत्रकार गणेश ‘पथिक’ ने यह गीत पढ़ा और सबकी सराहना-प्रशंसा लूटी-

प्रेमियों के प्रेम का आधार हूं,

पुष्प हूं मैं सुरभि पारावार हूं।

प्रकृति मां की गोद में पलता हुआ,

पवन की अंगुलि पकड़ चलता हुआ,

मैं तो शिशु सौंदर्य का भंडार हूं।

पुष्प हूं मैं सुरभि पारावार हूं।

चढूं मैं शव पर या शिवशीश पर

मुस्कराने का मिला आशीष वर।

मैं मनुज को ईश का उपहार हूं।

पुष्प हूं मैं सुरभि पारावार हूं।

शीत-वर्षा और आतप सह रहा,

मुस्कराता आंधियों में बह रहा।

आस का जलता ‘पथिक’ अंगार हूं।

पुष्प हूं मैं सुरभि पारावार हूं।

बहुचर्चित कवि-ग़ज़लकार राज शुक्ल ‘ग़ज़लराज’ ने अपनी यह सदाबहार ग़ज़ल सुनाकर भरपूर वाहवाही और तालियां बटोरीं-

यूँ साजिशों की उठती नज़र देखता रहा
कितना सहेगा मेरा जिगर देखता रहा

ज़ुल्मत मिटाने की थीं जिसे ख़्वाहिशें बहुत
चुपचाप वो हवा का कहर देखता रहा

जो अड़ गये बचाने को वो क़त्ल कर दिये
हर कोई उस सितम का असर देखता रहा

किस कौम का था कितना लहू बह गया यहाँ
मंज़र ये राज शामो-सहर देखता रहा।

ग़ज़लराज ने पिता की पावन स्मृतियों को समर्पित यह भावभरा गीत सुरीले सुर में गाया तो सबकी आंखें नम हो गईं और संयोजक गांधीमोहन के आवास की बैठक वाहवाह-तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी-

जिनके कंधों पे देखे थे मेले कभी
छोड़ते जो नहीं थे अकेले कभी
ढूंढतीं है निगाहें सुवह शाम अब
आज की भीड़ में वो कहाँ खो गए

सबसे मजबूत ही जो सहारे रहे
जो सुपर हीरो हर दम हमारे रहे
होने दी न जिन्होंने कभी कोई कमी
आँखों में आने दी न कभी भी नमी
क्यों पिताजी वो चिर निद्रा में सो गए
ढूंढतीं——————————
आप बिन जिंदगी कैसे कट पाएगी
धुंध क्या उलझनों वाली छंट पाएगी
आप होते तो होता नहीं ग़म कोई
आपकी है जरूरत बहुत आज भी
आप बिन राज हम शून्य से हो गए।
ढूंढतीं—————————–

उनके अतिरिक्त साहित्य सुरभि के अध्यक्ष राम कुमार कोली, डॉ. अखिलेश कुमार गुप्ता, लक्ष्वेश्वर राजू, पूनम गंगवार ‘पुष्पा’, डॉ. रेनू श्रीवास्तव, योगेश जौहरी, राजीव बिसारिया,मनोज सक्सेना मनोज, लोकगीतों के धनी रामधनी निर्मल, हास्य कवि मनोज दीक्षित टिंकू, राज कुमार अग्रवाल ‘राज’, प्रताप मौर्य मृदुल, अशोक कुमार सक्सेना, नरेश सक्सेना, डी.पी. शर्मा निराला, रामकृष्ण शर्मा, रीतेश साहनी एवं रमेश रंजन आदि ने भी सरस काव्य पाठ किया और भरपूर प्रशंसा-सराहना प्राप्त की।

गोष्ठी में काव्यरस मर्मज्ञ कांग्रेस नेता योगेश जौहरी, वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव बिसारिया और अशोक कुमार सक्सेना, नरेश सक्सेना आदि परिजनों के साथ ही बड़ी संख्या में मातृ शक्ति की भी सशक्त सहभागिता रही। ग़ज़लकार-आशुकवि राज शुक्ल ‘ग़ज़लराज’ ने अपनी सटीक आशु कविताओं से पूरे कार्यक्रम का बेहद ही सफल-सरस, भावपूर्ण एवं यादगार संचालन किया और गोष्ठी को सफलता के शिखर पर पहुंचाने में अविस्मरणीय योगदान दिया। गोष्ठी का समापन वयोवृद्ध गांधीवादी समाजसुधारक-व्यवसायी गांधी मोहन सक्सेना के भावपूर्ण आभार प्रदर्शन और सबको आग्रहपूर्वक कराए गए अल्पाहार और सुस्वादु भोजन से हुआ।

 

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