Saturday, April 11, 2026
03
20x12krishanhospitalrudrapur
previous arrow
next arrow
Shadow
Homeराज्यउत्तराखंडदुनिया में छाएगी उत्तराखंड की नेटल टी और फाइबर से बनी जैकेट,...

दुनिया में छाएगी उत्तराखंड की नेटल टी और फाइबर से बनी जैकेट, GI टैग मिलने के बाद बढ़ेगी मांग्

एफएनएन, देहरादून : उत्तराखंड में प्राकृतिक रूप से उगने वाली बिच्छू बूटी (कंडाली) की पत्तियों से चाय और रेशे से बन रही जैकेट, स्टोल और मफलर अब देश दुनिया में छाएंगे। प्रदेश में कई स्वयं सहायता समूह कंडाली के पौधे से रेशा तैयार करने के साथ चाय तैयार रहे हैं।

भौगोलिक संकेतांक (जीआई टैग) मिलने से नेटल फाइल से तैयार उत्पाद और चाय की वैश्विक स्तर पर मांग बढ़ेगी। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को मार्केटिंग की उम्मीद जगी है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बंजर भूमि पर बिच्छू बूटी प्राकृतिक रूप से उगाता है। इसे स्थानीय बोली में कंडाली कहा जाता है। वर्ष 2018 में उद्योग विभाग के प्रयासों से कंडाली के पौधे से रेशा तैयार किया गया।

चमोली जिले के मंगरौली गांव में रूरल इंडिया क्राफ्ट संस्था और उत्तरकाशी जिले के भीमतल्ला में जयनंद उत्थान समिति ने नेटल फाइबर से जैकेट, शॉल, स्टोल तैयार किए। इन उत्पादों का निर्यात करने के लिए अमेरिका, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड में सैंपल भेजे गए थे। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर लगने वाले हस्तशिल्प मेलों में इन उत्पादों को प्रदर्शित किया।
पहली बार नेटल फाइबर को जीआई टैग मिलने से उत्पादों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलेगी।

  • रूमधार और सुनहरीगाड़ में बन रही नेटल टी

टिहरी जिले के देवप्रयाग ब्लॉक के रूमधार और जाखणीधार के सुनहरीगाड़ में नेटल टी (चाय) बनाई जा रही है। करीब एक साल से रूमधार में राष्ट्रीय आजीविका मिशन सहयोग से स्थानीय स्वयं सहायता समूह की महिला नेटल टी बना रही हैं। करीब 80 ग्राम के पैकेट की कीमत सात रुपये है। एक साल में समूह 30 हजार की नेटल टी स्थानीय बाजार में बेच चुकी है। इसके साथ ही सुनहरीगाड़ में भी पूर्व प्रधान भगवती प्रसाद नौटियाल नेटल टी करीब छह माह से बना रहे हैं।

WhatsApp Image 2023-12-18 at 2.13.14 PM
IMG-20260328-WA0026
previous arrow
next arrow
  • ऊंचाई वाले गांवों में पाई जाती बिच्छू बूटी

रुद्रप्रयाग जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बिच्छू बूटी पाई जाती है। वर्तमान में इसका उपयोग मंदाकिनी बुनकर समिति देवलीभणि ग्राम के माध्यम से किया जा रहा है। संस्था द्वारा बिच्छू बूटी से सोफा कवर, मैट के साथ ही ऊन को मिलाकर जैकेट भी बनाई जा रही हैं। मंदाकिनी बुनकर समिति के संस्थापक डाॅ. हरिकृष्ण बगवाड़ी का कहना है बिच्छू बूटी के पौधे की लंबाई ढाई से तीन मीटर तक होती है। इससे धागे को तैयार करने की प्रक्रिया काफी जटिल है, जो पारंपरिक विधि से किया जाता है। एक क्विंटल बिच्छू बूटी से 25 से 30 किलो रेशा तैयार होता है। जिसकी कीमत तीन से चार हजार रुपये किलो तक है। ऊखीमठ के पर्यटन ग्राम सारी में भी काश्तकार प्रदीप भट्ट भी बिच्छू बूटी से रेशा बनाने का काम करते हैं। वह बताते हैं कि पारंपरिक प्रक्रिया में काफी समय लगता है।

  • ऐसे तैयार किया जाता है रेशा

बिच्छू बूटी के पौधे की लंबाई से ढाई से तीन मीटर तक होती है। इसे जंगलों से गटठर में लाया जाता है। इसके बाद, इसके डंगल को अलग-अलग कर छोटे-छोटे टुकड़े बनाए जाते हैं। इन टुकड़ों को खुले बड़े बर्तन में राख या साबुन के घोल में काफी देर तक उबाला जाता है। इसके बाद इसे डंडे से काफी देर तक पीटने के बाद रेशा अलग-अलग होने लगता है, जिसे निकाला जाता है। इस रेशा को धागा का रूप दिया जाता है। अगर, इस रेशा से जैकेट या अन्य पहनने के उत्पाद बनाने होते है, तो उसमें ऊन को भी मिलाया जाता है। बाजार में नेटल फाइबर जैकेट की 2500 से 3000 रुपये तक है।

  • कंडाली की चाय से कमाई

पौड़ी जिले में कंडाली चाय तैयार की जा रही है। इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिकी मजबूत हो रही है। परियोजना निदेशक डीआरडीए संजीव कुमार राय ने बताया कि विकास खंड पाबौ व द्वारीखाल में एनआरएलएम के दो समूह कंडाली से चाय बना रहे हैं। जिसके उत्पादन से समूह माह में 10 हजार से अधिक की आय कमा रहे हैं। कहा, कंडाली के अन्य उपयोगों को लेकर भी समूहों को जल्द ही प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।

 

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments