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बरेली में भी कई दशकों तक कायम रहा है ‘खयालगोई’ का सुनहरा दौर, अब इतिहास बनी संगीत की यह विधा

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गणेश ‘पथिक’/निर्भय सक्सेना

एफएनएन ब्यूरो, बरेली। खयालगोई कार्यक्रमों के आयोजन अब भले ही बीते दौर की बात बन चुके हों लेकिन एक जमाना था जब बरेली में भी खयालगोई के प्रोग्राम रात-रात भर चलते थे और इनमें सुनाने-सुनने वाले भी खूब जुटते थे। हालांकि अब हर हाथ में मोबाइल फोन वाले मौजूदा दौर में न खयालगो बचे हैं और न खयालगोई की बातें बताने वाले लोग ही रह गए हैं। 

बरेली के नामचीन्ह ख्यालगो अनिल कपूर उर्फ मुल्लू खलीफा

बरेली में खयालगोई के कार्यक्रमों का अक्सर आयोजन कराते रहे और तुर्रा पक्ष में बुलंद आवाज में ख्याल सुनाने वाले बिहारीपुर मोहल्ले के अनिल कपूर उर्फ मुल्लू खलीफा बताते हैं कि खत्री धर्मशाला, बिहारीपुर में उन्होंनेवर्षो तक खयालगोई के कार्यक्रम आयोजित कराए हैं। बरेली के साहूकारा, गुलाबनगर कालीबाड़ी, बिहारीपुर में भी खयालगोई के आयोजन अक्सर होते रहते थे इनमें प्रदेश भर से जाने-माने खयालगो आते थे। अनिल कपूर उर्फ मुल्लू खलीफा खयालगोई में बाबूराम वर्मा के शागिर्द रहे। बाबूराम ने ही अनिल कपूर को खलीफा की पगड़ी पहनाई थी।

वर्ष 2000 से पहले तक बरेली में खयालगोई के कार्यक्रम खूब होते थे। इनमें दिनेश शर्मा, दुर्गा प्रसाद, ओम प्रकाश, मोहम्मद खलीफा, चुन्नू चमचम आदि बाहरी खयालगो भी आते थे। बरेली के स्थानीय ख्यालगो में बाबू राम, शिव नंदन प्रसाद, शंकर लाल कातिब, गंगा प्रसाद आदि तुर्रा पक्ष से पढ़ते थे जबकि राम चरन लाल कलगी पक्ष के स्थानीय ख्यालगो में काफी मशहूर थे।

मल्लू खलीफा ने बताया कि मदारी गेट निवासी स्वर्गीय नत्था सिंह भी खयालगोई में माहिर थे। नत्था सिंह ने सगभग 100 वर्ष पहले 1926 में बरेली में खयालगोई के कार्यक्रम शुरू कराए थे। उनसे ही प्रभावित होकर वह खयालगोई में आये और प्रदेश भर में नाम भी कमाया।

पिता रूप नारायण कपूर और माता सरला कपूर के घर में अनिल कपूर का जन्म 25 मई 1959 को हुआ था । तिलक और आजाद इंटर कॉलेजों में पढ़ाई हुई। हिंदू जागरण मंच के कोषाध्यक्ष भी रहे। वर्तमान में बीजेपी में महानगर अध्यक्ष अधीर सक्सेना की टीम में कार्य कर रहे है । 

मल्लू खलीफा बताते हैं, “अरब के एक शेख व्यापारी ने भारत के एक गांव में दो पक्षों को गायकी करते देखा तो एक पक्ष को तुर्रा और दूसरे पक्ष को अपनी कलगी देकर उसका कलगी नामकरण कराया था।   वरिष्ठ उर्दू-हिंदी साहित्यकार-लेखक साहूकारा निवासी रणधीर प्रसाद गौड़ ‘धीर’ बताते हैं कि उनके पिता देवीप्रसाद गौड़ ‘मस्त’ भी प्रसिद्ध ख्यालगो थे। प्राचीन काल में सूफी-संतों ने ख़यालगोई की विधा को प्रारंभ किया था। बाद में यह विधा बरेली में भी खूब पनपी। दरअसल, खयालगोई विद्या में दो दल कलगी और तुर्रा होते हैं। कलगी दल वाले शक्ति और तुर्रा दल वाले ब्रह्म के उपासक माने जाते हैं। वाद्य यंत्रों में चंग और चमेली का प्रयोग आम है। 

कलगी दल में लाला राजा राम, भज्जू बाबा मोती पुरी, पं. देवी प्रसाद गौड़ ‘मस्त’ पं. श्याम लाल शर्मा ‘श्याम’, रामचरन ख्यालगो, त्रिवेणी सहाय ‘सेहर’ लोचन, चुन्नी लाल, ज़मीर साहब, रूप किशोर आदि प्रमुख थे जबकि तुर्रा दल में दया नारायन टंडन, कन्हैया लाल, पन्ना लाल, राम कुमार राधेरमन, शिवनन्दन, बाबूराम, विशन सिंह छैला, हरीओम आदि के नाम खास हैं। बरेली में ख्यालगोई के आयोजन कराने लिए इलायची बांटने का भी रिवाज था। वर्ष में एक-दो आयोजन तो अखिल भारतीय स्तर के होते ही थे जो पूरी रात चलते थे। भारी ताजाद में श्रोतागण पूरी रात इनका आनंद लेते थे। आयोजक कीमती तोहफे और धन देकर गायकों को कई-कई दिन सुनते थे।

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