वरिष्ठ उर्दू-हिंदी साहित्यकार-लेखक साहूकारा निवासी रणधीर प्रसाद गौड़ 'धीर' बताते हैं कि उनके पिता देवीप्रसाद गौड़ 'मस्त' भी प्रसिद्ध ख्यालगो थे। प्राचीन काल में सूफी-संतों ने ख़यालगोई की विधा को प्रारंभ किया था। बाद में यह विधा बरेली में भी खूब पनपी। दरअसल, खयालगोई विद्या में दो दल कलगी और तुर्रा होते हैं। कलगी दल वाले शक्ति और तुर्रा दल वाले ब्रह्म के उपासक माने जाते हैं। वाद्य यंत्रों में चंग और चमेली का प्रयोग आम है।