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राजबाला धैर्य संपादित पत्रिका ‘विशिष्ट बचपन’ का हुआ विमोचन, सरस काव्य गोष्ठी और वरिष्ठ कवियों का अभिनंदन 

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एफएनएन ब्यूरो, बरेली। वर्ष 1982 से निरंतर संचालित साहित्यिक संस्था ‘कवि गोष्ठी आयोजन समिति‘ के तत्वावधान में बदायूं रोड पर सरस काव्य गोष्ठी आ़योजित की गई। वरिष्ठ कवयित्री-समाजसेवी द्वारा संपादित ‘विशिष्ट बचपन’ पत्रिका का विमोचन एवं दो वरिष्ठ कवियों का सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं समिति अध्यक्ष रणधीर प्रसाद गौड़ 'धीर' ने की। मुख्य अतिथि हास्यव्यंग्यकार दीपक मुखर्जी 'दीप‘ और विशिष्ट अतिथि शाहजहांपुर से आए संतोष कुमार ‘श्रद्धा’ रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ माॅं शारदे के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और वाणी वंदना से किया गया। प्रथम सत्र में मंचासीन और अन्य वरिष्ठ कवियों द्वारा लोकप्रिय कवयित्री एवं कई साल से विशेष बच्चों का पालन-शिक्षण केंद्र चला रहीं राजबाला धैर्य द्वारा संपादित ‘विशिष्ट बचपन पत्रिका’ के जनवरी-मार्च 2025 अंक का विमोचन किया गया।

द्वितीय सत्र में अध्यक्ष रणधीर गौड़ ‘धीर’, कार्यक्रम संयोजिका राजबाला धैर्य और कवि गोष्ठी आयोजन समिति के सचिव उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट ने साहित्यिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार गणेश ‘पथिक’ और शाहजहांपुर के प्रख्यात कवि डॉ. प्रदीप बैरागी को शाॅल उढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर  सम्मानित किया।

तृतीय सत्र में सरस काव्य गोष्ठी हुई जिसमें कवियों ने अपनी एक से बढ़कर एक बेहतरीन रचनाऍं प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लूटी।

संस्था द्वारा सम्मानित किए गए वरिष्ठ कवि-पत्रकार गणेश ‘पथिक’ का मिलन की ऋतु बसंत में नायिका की विरह को स्वर देता यह लोकगीत खूब पसंद किया गया-                                             सखि बसंत आ़यो।                                                                आए सबके पाहुन फिरि घर, पर न कन्त आयो?                        सखि बसंत आ़़यो।

श्री ‘पथिक’ ने अपने इस चर्चित नवगीत पर भी खूब वाहवाही और तालियां बटोरीं-

दुर्योगों की शीतलहर में शॉल ओढ़कर आशाओं की                     नन्हा दीपक रात काटता आस छोड़ सुख-सुविधाओं की।                ‘पथिक’ प्रकाश बिंदुओं ने घनघोर अंधेरों को जीता है,                       देवासुर संग्राम की परिणति दुष्टों का श्मशान हो गई।                   

गीतकार उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट ने अपना श्रेष्ठ श्रांगारिक गीत सुनाकर खूब प्रशंसा और तालियां बटोरीं-
मत रूठो अब छोड़ो गुस्सा, प्रेम-रंग जीवन में छाया।
आ जाओ भुजपाशों में तुम, मौसम आज वसंती आया।।

वरिष्ठ कवयित्री-समाजसेवी राजबाला धैर्य ने सुनाया-
भाव पुष्प हृदय में लेकर
करते हम सब भारत माॅं का वंदन
आम, नीम, बरगद और पीपल
महक रहा है शीतल चंदन।

राजबाला धैर्य का यह चर्चित भक्तिगीत भी विशेष रूप से सराहा गया-

सुंदर छबि मेरे लला की, दुनिया दर्शन की अभिलाषी                   धरा झूमती गगन है गाता मिलने को सृष्टि भी प्यासी                       सखीं सब सगुन मनाएं राम घर अंगना आए।

लोकगीत विधा के चर्चित हस्ताक्षर रामधुनी ‘निर्मल’ ने यह सुरीली तान छेड़ी तो सब वाहवाह करते रहे-                                  वेलेंटाइन डे में हमसे हुइगा कसूर, गोरी हाजिर है तेरा बंधुआ मजूर।

हिंदी ग़ज़ल और मुक्तक विधा के चर्चित हस्ताक्षर रामकुमार भारद्वाज ‘अफरोज़’ ने अपनी इस ग़ज़ल पर ढेर सारी तालियां और वाहवाहियां लूटीं –
चुटकुले इतने चुटीले हो गए
शायरी के पेंच ढीले हो गए।                                                      बौर की खुशबू हवा में क्या उड़ी                                           कोयलों के सुर सुरीले हो गए।

राजकुमार अग्रवाल ‘राज’ ने यह ग़ज़ल सुनाकर सबकी वाहवाही बटोरी-मन के भीतर का अंधेरा दूर हो,                                      कुछ दीए ऐसे जलाएं दोस्तों                                                    कुछ दीए ऐसे हैं जिनको देखकर.                                             लौट जाती हैं हवाएं दोस्तों।

युवा कवि आदित्य यदुवंशी का यह देश भक्ति गीत सुनकर सब वाहवाह कर उठे-मैं जाता हूं सरहद पर मां मत मेरी चिंता तुम करना। मेरा है उत्तरदायित्व सदा भारत माता की सेवा करना।

मुख्य अतिथि दीपक मुखर्जी ‘दीप’ ने हमेशा की तरह खिलंदड़े अंदाज में चुटीली व्यंग रचना सुनाकर तालियां बटोरीं-                            यहां रक्तबीज कौन बोता है,                                                 मनुष्य भिंडी की तरह मुलायम क्यों नहीं होता है?                       यहां आग कौन लगा जाता है?

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि-साहित्यकार और कवि गोष्ठी आयोजन समिति के अध्यक्ष रणधीर प्रसाद गौड़ ‘धीर’ ने जब यह भक्तिगीत लय-सुर में सुनाया तो सब झूम उठे और साथ-साथ गाने लगे-       नाम जो मुख पर श्रीराम का लाता नहीं,                                     वह भोगता है नर्क को  स्वर्ग को पाता नहीं।                            ज़िंदगी अपनी है जैसे ओस का मोती कोई                                 ढल गया तो ढल गया फिर हाथ में आता नहीं।

शाहजहांपुर से आए और सम्मानित हुअ वरिष्ठ कवि डॉ. प्रदीप वैरागी का बसंत पर केंद्रित यह गीत भी खूब पसंद किया गया-           सरसों फूली खेत में आया पर्व बसंत।                                रंग-बिरंगी धरा पर बिखरी छटा अनंत।                                      कंत ने मन को मोहा।

विशिष्ट अतिथि शाहजहांपुर से आए संतोष कुमार ‘श्रद्धा’ की यह ग़ज़ल भी सराही गई-                                                           कश्ती थी समन्दर में पतवार नहीं थी,                                           मैं जल तो रहा था मगर आग नहीं थी।                                    आंखों में मेरी बरसात का मौसम सा आ गया                          बरसात हो रही थी बरसात नहीं थी।

काव्य गोष्ठी, पत्रिका विमोचन और साहित्यकार अभिनन्दन समारोह  में हास्य कवि भारतेंद्र सिंह, पत्रकार विनीत सक्सेना, डॉ. अखिलेश गुप्ता, सात्विक चौधरी, बीना, रीतेश साहनी एवं रमेश रंजन आदि की भी सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम का काव्यमय सफल संचालन हास्य एवं भक्ति के वरिष्ठ कवि मनोज दीक्षित टिंकू ने किया।                                                                         

                  

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