प्रशिक्षण कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. संजय कुमार सिंह, संयुक्त निदेशक (शोध) ने बताया कि कृत्रिम गर्भाधान तकनीक पुरानी लेकिन आज भी प्रासंगिक है। इसके जरिए ज्यादा से ज्यादा मवेशियों को बांझपन की समस्या से छुटकारा दिलाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जर्मप्लाज्म तकनीक में सुधार होगा तो मवेशियों की प्रजनन क्षमता भी जरूर बढ़ेगी। उन्होंने मवेशियों में बांझपन के प्रमुख कारणों एनेस्ट्रस और रिपीट ब्रीडर्स के बारे में भी विस्तार से प्रकाश डाला।
निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त ने बताया कि थारपारकार नस्ल को बढ़ाने के लिए ब्रीडिंग कार्यक्रम चलाये जायेंगे तथा ब्रीडिंग क्षेत्र को चयनित किया जायेगा। आईवीआरआई के फार्म में थारपारकार गायों की संख्या को बढ़ाया भी जायेगा। साथ ही थारपारकर गायों के वीर्य का अनुरक्षण भी किया जायेगा। संस्थान में थारपारकर गायों के सीमेन की 5 हजार डोज जर्म प्लाज्म केन्द्र में तैयार की जायेगी।