काव्य गोष्ठी में डॉ. महेश मधुकर, रामकुमार कोली, रजत कुमार, गांधी मोहन सक्सेना, रामधनी निर्मल, रामकुमार भारद्वाज 'अफरोज़', डॉ. रामशंकर शर्मा 'प्रेमी', प्रताप मौर्य 'मृदुल', रीतेश साहनी, उपमेंद्र सक्सेना एवं श्रीमती नीरज और अन्य रससिद्ध कवियों ने अपनी यादगार-श्रेष्ठ कविताएं, गीत, छंद सुनाकर खूब वाहवाही तो बटोरी ही; कालजयी-महान कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को भावभरे, काव्यमय श्रद्धासुमन भी समर्पित किए। कवियों ने ऋतुराज वसन्त के स्वागत में भी अपनी एक से बढ़कर एक कविताएं प्रस्तुत कीं और समारोह को स्मरणीय बना दिया।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठतम कवि-साहित्यकार रणधीर प्रसाद गौड़ 'धीर' की इस ग़ज़ल के हर शेअर पर काव्य रसिक देर तक वाहवाह करते और तालियां बजाते रहे-
तुम क्या गए चमन के नज़ारे चले गए।
महफिल से उठके दर्द के मारे चले गए।
पानी के साथ बहके किनारे चले गए।
जैसे भी गुजरी उम्र गुजारे चले गए।