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वरिष्ठ पत्रकार चन्दन बंगारी सहित 12 लोगों को आनन्दश्री सम्मान

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  • हिमालयी संस्कृति में भोटिया पड़ाव बचाने की अपील

एफएनएन, हल्द्वानी : वरिष्ठ कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ के 11वां स्मृति समारोह में हिमालयी संस्कृति को बचाने की मुहीम में जुटने की अपील की गई। इस अवसर पर जन सरोकारों से जुड़े 12 लोगों को आनन्दश्री सम्मान दिया गया। पीलीकोठी स्थित हरगोविन्द सुयाल इण्टर कालेज के केशव सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ रेलवे के उच्चाध्किरी रहे मंगल सिंह कुटियाल, उच्चशिक्षा उत्तराखण्ड के निदेशक डा. सी.डी.सूंठा व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलन व पुष्पांजलि कर किया।

हिमालय संगीत शोध समिति के बाल, युवा व किशोर कलाकारों ने सरस्वती वन्दना के बाद श्रीनिवास मिश्र की रचनाओं का कर्णप्रिय समूह गायन किया। आयोजन सचिव डा.पंकज उप्रेती, फली सिंह दताल, धीरज उप्रेती ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। संचालक भुवनेश कुमार कर रहे थे।समारोह की अध्यक्षता कर रहे उच्चशिक्षा उत्तराखण्ड के प्रथम निदेशक प्रोफेसर पी.सी.बाराकोटी, मुख्य अतिथि मंगल सिंह गर्ब्याल, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू सहित वक्ताओं ने वरिष्ठ कथाकार पत्राकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने निडरता के साथ जनपक्षीय पत्रकारिता की और हिमालय की संस्कृति के लिये कभी समझौता नहीं किया।

साथ ही दारमा घाटी की महान दानवीरांगना जसुली बूढ़ी शौक्याणी का स्मरण करते हुए उनके द्वारा बनवाई गई धर्मशालाओं को संरक्षित करने और पड़ावों की प्रचीन परम्पराओं को संजोए रखने की अपील की। शोध पत्र वाचकों ने ‘भोटिया पड़ाव’ शब्द की सार्थकता को बनाए रखने की बात कही।

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संगोष्ठी के विषय ‘हिमालयी संस्कृति और लला जसुली’ पर व्याख्यान देने के लिये राजकीय महाविद्यालय मालधन, रामनगर से पधारे आधर वक्ता प्रोफेसर जी.सी. पन्त ने कहा भारतवर्ष में आर्यों के आगमन के पूर्व से शौका समुदाय लगभग पूर्व वैदिक काल से हिमालय की गोद में भीषण तम भौगोलिक परिस्थितियों में भी न केवल अपना अस्तित्व बनाए रख सका बल्कि अपनी गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने में भी सपफल रहा है।

मारछा, तोलछा, रोंगपा, जाड़ तथा शौका समुदाय ने प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए इस क्षेत्रा में एक समानान्तर सभ्यता को यहां विकसित किया। इन प्रकृति पुत्रों एवं पुत्रियों का जीवन और धर्म प्रकृति ही होकर रह गया। उत्तराखण्ड या भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विश्व की किसी भी आदिम जाति समूह में मध्य हिमालय निवासी इस शौका समुदाय जैसी जीवटता ,उद्यमशीलता, प्रगति शीलता तथा विशिष्ट संस्कृति के साथ भीषण तम भौगोलिक परिस्थितियों और प्रतिकूल जलवायु में खुशी से जीने की कला के साथ पौराणिक काल से ही व्यापार के जरिए अपने कठिनतम जीवन को खुशहाल बनाने में माहिर यह मानव समुदाय अपनी कुशाग्र बुद्ध, कड़ी मेहनत और जन्मजात विनम्रता के कारण अन्य मानव समुदायों से अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में सदा सफल रहा है।

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स्वतंत्रता से पूर्व पंडित नैनसिंह , किशन सिंह और मणिकंपासी जैसे सरवेयर इसी माटी में पैदा हुए। दान वीरांगना जसुली देवी शौक्याण जिन्होंने लगभग 300 धर्मशालाएं कुमाऊं, गढ़वाल एवं नेपाल के पैदल मार्गो में बनवाई। जिनके अवशेष आज भी यहां पाए जाते हैं। गौरा देवी, बछेंद्री पाल, चन्द्रप्रभा एतवाल तथा गंगोत्रा गर्ब्यांल जैसी नन्दा देवी की पुत्रियों ने पर्वत राज हिमालय की गोद का मान बढ़ाया है। ये शौका भेड़, बकरियों, घोड़े, चंवर गाय एवं अपने अन्यतम साथी झुपुआ कुत्ते के साथ पर्वतों, घाटियों दर्रों को पार करते हुए 1962 से पहले तिब्बती मण्डियों में जाकर व्यापार करते थे। यह मानव समुदाय वस्तु विनिमय में पारंगत था। उनकी एक सांकेतिक भाषा भी हुआ करती थी।

1959 में दलाई लामा के स्व निर्वासन, 1962 के चीनी आक्रमण ने इन पर्वत पुत्रा-पुत्रियों का व्यापारिक जीवन मानो ठप सा कर दिया। रही सही कसर पूरी कर दी वन्य जीव अभयारण्यों ने। उत्तराखण्ड राज्य की सीमा के अन्तर्गत कई ऐसे स्थान हैं जो इस मानव समुदाय के श्रम एवं संघर्ष के साथ व्यावसायिक तथा व्यापारिक बुद्ध के परिचायक हैं। प्रायः उस समय इन छोटी-छोटी व्यापारिक मण्डियों को शौकाथल कहा जाता था। अंग्रेजों के कुमाऊं एवं गढ़वाल में अपनी कमिश्नरियां स्थापित कर लेने के बाद इस मानव समूह को भोटिया कहने का प्रचलन चल पड़ा।

अपने व्यवसाय तथा व्यापार के लिए यह मानव समुदाय जहां-जहां पड़ाव डालता था उस स्थान को भोटिया पड़ाव कहा जाने लगा। टनकपुर शहर से लगा बालखेड़ा ग्राम सभा का भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी शहर का भोटिया पड़ाव तथा रामनगर का भोटिया पड़ाव इस तथ्य के उदाहरण हैं। कहीं-कहीं इन स्थानों को शौकाथल और चौड़ नाम से भी जाना गया जैसे हल्द्वानी का लामाचौड़। यह समाज जिन उत्तुंग शिखरों के बीच हिमालय के अन्तिम छोर में निवास करता आ रहा है वहां आज भी समस्याओं के पहाड़ ही पहाड़ खड़े हैं।

  • इन्हें मिला ‘आनन्दश्री सम्मान’

डा.सी.डी.सूंठा, निदेशक उच्चशिक्षा उत्तराखण्ड, सहा. आयुक्त सेलटेक्स बागेश्वर अशोक गर्ब्याल, अध्यक्ष भू.पू. सैनिक वेलपफेयर सोसाइटी बेरीनाग लक्ष्मण सिंह डांगी, सेनि. अधकारी एवं जनसरोकारों से जुड़े राम सिंह सोनाल, लोक संस्कृति संरक्षण में अग्रणीय जीवन सिंह सीपाल, ऐतिहासिक फोटो संकलक चन्द्र सिंह सीपाल, प्रोफेसर दीपा गोबाड़ी, पत्रकार इलेक्ट्रानिक मीडिया भूपेश रावत, विनोद काण्डपाल, पत्रकार प्रिन्ट मीडिया संदीप मेवाड़ी, मोहन भट्ट, चन्दन बंगारी।

  • पुस्तकों का विमोचन हुआ

समारोह में प्रोफेसर पूर्णिमा भटनागर की कहानी संग्रह ‘अनछुवे दरीचे’, ‘जिन्दगी’, प्रोपफेसर दीपा गोबाड़ी के कहानी संग्रह ‘च्येली’ और लेखक श्रीमती अमृता पाण्डे का उपन्याय ‘सांझ का सूरज’ का विमोचन किया गया।

  • पर्वतीय उत्पादों के स्टाल

मुनस्यारी हाउस की ओर से पर्वतीय उत्पादों के स्टाल लगाये गये थे। प्रयाग रावत सहित सहयोगियों ने जड़ी-बूटियां, उफनी वस्त्रों, रिंगाल व काष्ठ की बनी सामग्रियों के बारे में जानकारी दी और बताया कि मोटे अनाज सहित पर्वतीय कुटीर उद्योग की सामग्री की दिल्ली सहित अन्य राज्यों में मांग बढ़ रही है।

  • ये लोग मौजूद थे

समारोह में प्रो.चन्द्रा खाती, डा.अनीता जोशी, देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, मनोहर सिंह मर्तोलिया, गोपाल सिंह मर्तोलिया, डा. आशा हर्बोला, डा. जयश्री भण्डारी, डा. मीना राणा, एनसी तिवारी, प्रोफेसर अतुल जोशी, राजेन्द्र प्रसाद पांडेय, प्रोफेसर एचडी , तिवारी,डा. जेसी जोशी, डा. विक्रम सिंह राठौर, डा. सुमन कुमारी, डा. कल्पना साह, अशोक जोशी, डा. निर्मला जोशी, डा. पूनम रौतेला, डा. रोमा साह, श्रीमती गीता उप्रेती, आरती उप्रेती, हरीश पंत, जगमोहन रौतेला, भुवन कांडपाल आदि।

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