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डबल इंजन की सरकारें…लेकिन ‘विकास’ तो ढूंढते ही रह जाइएगा जनाब!

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400 से भी ज्यादा फैक्टरियों वाले रुद्रपुर में वर्षों से है तरक्की का चक्का जाम
ट्रंचिंग ग्राउंड तक नहीं, हाईवे पर किच्छा रोड किनारे दिखता है मलबे का पहाड़
लोगों को मारे डाल रहा कूड़े के जलते ढेरों से चौबीसों घंटे उठता जहरीला धुंआ

गणेश ‘पथिक’
रुद्रपुर है यह साहब…उत्तराखंड की शान और जान। 520 से ज्यादा फैक्टरियों वाला शहर….पहाड़ के अर्थतंत्र को गति देने वाला सिडकुल यहीं तो है। पहाड़ी राज्य के अलावा पड़ोसी उत्तर प्रदेश के भी दर्जनों शहरों से नौजवान-कामगार रोजगार, नौकरियों की तलाश में हर साल यहां आते हैं और फिर यह शहर कुछ ऐसी गर्मजोशी से उन सबको ऐसे अपने सीने से चपकाता है कि वो सब यहीं के होकर रह जाते हैं। पिछले दो दशक में रुद्रपुर का आकार निश्चय ही आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ा है लेकिन शहर के ‘विकास’ का तो वर्षों से चक्का जाम पड़ा है जनाब। यही तीखी-कड़वी हकीकत है। जी हां, केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों का ‘करिश्माई’ डबल इंजन भी न सिर्फ रुद्रपुर को तरक्की की राह पर लेकर चल पड़ने में बुरी तरह फेल हुआ है, बल्कि हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के ढाई-तीन साल भी शहर को नजूल के महा अभिशाप तक से मुक्ति नहीं दिलवा पाया है।
पहाड़ के विकास पुरुष के नाम से चर्चित रहे स्व. नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर में भी विकास का पहिया घूमना शुरू हुआ था। तिवारी जी के प्रयासों से ही शहर में फैक्टरियों की स्थापना का श्रीगणेश हुआ। एक ही परिसर में बहुत सारी छोटी-बड़े कल-कारखानों की कल्पना भी सिडकुल की स्थापना के रूप में सच साबित हुई। लेकिन…अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी कमोबेश सभी सरकारों की ढुलमुल नीतियों और प्रशासन के लचर रवैये के चलते रुद्रपुर में विकास का चक्का सरपट दौड़ने के बजाय पटरियों से ही उतर गया। और यह सब अत्यंत विस्मयकारी और हृदयविदारक इसलिए भी है क्योंकि इस पर्वतीय प्रदेश की ट्रेन को पिछले कई सालों से केंद्र की मोदी और प्रदेश की त्रिवेंद्र सरकार का डबल इंजन चला रहा है।
जी हां, ऊधमसिंह नगर-नैनीताल संसदीय सीट से भाजपा के अजय भट्ट सांसद हैं तो रुद्रपुर विधानसभा सीट पर भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल का कब्जा है। मेयर रामपाल सिंह भी भाजपा के ही हैं और रुद्रपुर नगर निगम में भाजपा पार्षदों का ठीकठाक बहुमत भी है। बावजूद इसके शहर समस्याओं के मकड़जाल से घिरा हुआ है। कुल 520 फैक्टरियों वाले रुद्रपुर शहर में संवेदनशून्य सरकारी तंत्र, बेपरवाह लालफीताशाही और वैश्विक महामारी कोरोना की तिहरी मार से उबरकर तकरीबन 400 कल-कारखाने ही इस वक्त चालू हालत में हैं। यहां टाटा, मारुति, बजाज, नैस्ले जैसी तमाम बड़ी फैक्टरियां हैं लाखों आप्रवासी कामगारों को यहां रोजगार मिला हुआ है। बावजूद इसके…शहर की तरक्की की नब्ज दिन-ब-दिन ठंडी ही पड़ती जा रही है।

नजूल भूमि पर बसा है पूरा रुद्रपुर

पूरा रुद्रपुर शहर नजूल की सरकारी जमीन पर बसा हुआ है। मतलब यह कि अगर सरकारी बुलडोजर चले तो शहर की एक भी इमारत जमींदोज होने से बच नहीं पाएगी। नैनीताल हाईकोर्ट तो ढाई-तीन साल पहले रुद्रपुर में नजूल की भूमि से बलपूर्वक अतिक्रमण हटाने का फरमान जारी भी कर चुका है लेकिन वोटों की राजनीति की मजबूरी के चलते भाजपा की मौजूदा त्रिवेंद्र सरकार भी नजूल की भूमि से अतिक्रमण हटवाकर हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन कराने की हिम्मत नहं जुटा पा रहा है।

नजूल भूमि ने छुड़वाई मेयर से उनकी कुर्सी

भाजपा खेमे से महापौर चुने गए रामपाल सिंह तो नजूल भूमि की वजह से ही चुनाव के बाद से ही अपनी कुर्सी पर नहीं बैठ पाए हैं। दरअसल, मेयर चुनाव में रामपाल सिंह ने जनता के बीच घोषणा की थी कि नजूल भूमि की समस्या हल करवाकर कब्जेदारों को उसका मालिकाना हक दिलवाएंगे। लेकिन मेयर बनने के करीब ढाई-तीन साल बाद भी चाहकर भी वे अपना चुनावी वायदा नहीं निभा पाए हैं। चुनाव के दौरान पब्लिक के बीच उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक नजूल भूमि पर कब्जेदारों को मालिकाना हक नहीं दिलवा दूंगा, तब तक अपनी कुर्सी पर नहीं बैठूंगा। बस उनकी इसी शपथ ने उन्हें नगर निगम के अपने आफिस में मेयर की सरकारी कुर्सी पर बैठने से नैतिक रूप से रोक रखा है। नगर निगम के सदन में ठीकठाक बहुमत होने के बावजूद सियासी मजबूरियों के चलते भाजपा पार्षद भी इस मामले में एकदम बेबस हैं।
प्रशासन भी शहर की व्यवस्थाओं को सुधारने के सवाल पर पूरी तरह अपने कंधे डाल चुका है।

गलियां ही नहीं, मेन रोड भी कीचड़ से बजबजा रहे

400 से भी ज्यादा चालू हालत में छोटी-बड़ी फैक्टरियों वाले इस शहर पर सरसरी निगाह डालें तो हर तरफ गंदगी की भरमार है ।गली-मोहल्लों की सड़कें ही नहीं, शहर के व्यावसायिक इलाकों के भीड़भाड़ भरे मेन रोड और उनकी नाले-नालियां भी कूड़े-कचरे के अंबारों और गंदगी के ढेरों के बीच बदबू मारती रहती हैं। आलम यह है कि शहर का स्ट्रीट लाइट सिस्टम पूरी तरह ठप है। ट्रैफिक सिग्नल खराब होने की वजह से हर चौराहे पर घंटों भारी जाम रहता है। सुबह-शाम के वक्त तो भारी ट्रैफिक जाम के चलते शहर की ‘लाइफलाइन’ ही देर तक थमी सी रहती है।

नहीं मिल पाया शहर को एक अदद ट्रंचिंग ग्राउंड

शहर वर्षों से एक अदद ट्रंचिंग ग्राउंड की तलाश में है लेकिन डबल इंजन की सरकारें भी उसकी इस छोटी सी जरूरत तक पूरी नहीं कर पा रही हैं। आलम यह है कि शहर भर का कूड़ा नगर निगम की गाड़ियों में भरकर हाईवे पर किच्छा रोड किनारे वर्षों से फेंक दिया जा रहा है। शहर भर का कूड़ा-कचरा इकट्ठा होने से यहां मलबे का पहाड़ जैसा बन गया है। उस पर भी जल रहे कूड़े-कचरे से उठता जहरीला धुआं रोजाना हाईवे से गुजरने वाले हजारों वाहन चालकों, मुसाफिरों को गंभीर रूप से बीमार बनाकर वक्त से पहले ही मारे डाल रहे हैं।

बरसात आते ही नरक ही बन जाता है पूरा रुद्रपुर

बारिश के चार-पांच महीने तो रुद्रपुर शहर की शक्ल जलभराव-गंदगी से बजबजाते नरक जैसी रहती है। ड्रेनेज, सीवरेज सिस्टम बाबा आदम के जमाने का होने की वजह से गाबा चौक से लेकर अग्रसेन चौक, डीडी चौक और रोडवेज परिसर सब कई-कई फुट गंदे-बरसाती पानी से कई-कई रोज तक ताल-तलइयों जैसे लबालब रहते हैं।

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