Monday, July 15, 2024
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सत्ता के लालच में कैसे इंदिरा गांधी ने लिखी थी आपातकाल की पटकथा, कुछ इस तरह जल रहा था भारत

25 जून की वह तारीख जिसको सोचकर सिहरन सी उठती है 25 जून 1975 का वह दिन आज भी भारतवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है इसी दिन आपातकाल लगाने की घोषणा हुई थी। 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक देश में आपातकाल लगा था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 25-26 जून, 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपा गया आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था। इस काले धब्बे का कारण कोई और नहीं खुद को आजाद भारत का निर्माता कहने वाली कांग्रेस पार्टी थी। कांग्रेस के दामन पर लगी यह दाग को पार्टी आज तक मिटा नहीं पायी है। 25 जून 1975 की वो काली रात को याद कर आज भी लोग सहम उठते हैं।

हाइकोर्ट का फैसला बना आपातकाल की वजह

कहा जाता है कि आपातकाल की नींव 12 जून 1975 को ही रख दी गई थी. इस दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया था और उनके चुनाव को खारिज कर दिया था. इतना ही नहीं, इंदिरा पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर और किसी भी तरह के पद संभालने पर रोक भी लगा दी गई थी। इंदिरा आसानी से सिंहासन खाली करने के मूड में नहीं थीं। संजय गांधी कतई नहीं चाहते थे कि उनकी मां के हाथ से सत्ता जाए। उधर विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बना रहा था. नतीजा ये हुआ कि इंदिरा ने 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू करने का फैसला लिया। आधी रात इंदिरा ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से आपाताकाल के फैसले पर दस्तखत करवा लिया।

21 महीनों तक आपातकाल की आग में जला था देश

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति से आपातकाल वाले घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर ले ली। इसके बाद 26 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक के लिए देश आपातकाल की आग में जलता रहा। प्रधानमंत्री ने इस आपातकाल को समय की मांग व देश के लिए आवश्यक बताया था। लेकिन उनके इस करतूत के पीछे की वजह कुछ और थी। माना जाता है कि देश को आपातकाल में झोंकने की कहानी 12 जून 1975 को ही लिखी जा चुकी थी।

कैसे खत्म कर दिए गए था नागरिकों के मूल अधिकार

नागरिकों के सभी मूल अधिकार खत्म कर दिए गए थे। राजनेताओं को जेल में डाल दिया गया था. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई थी. पूरा देश सुलग उठा था. जबरिया नसबंदी जैसे सरकारी कृत्यों के प्रति लोगों में भारी रोष था. हालांकि यह आपातकाल ज्यादा दिन नहीं चल सका। करीब 21 महीने बाद लोकतंत्र फिर जीता, लेकिन इस जीत ने कांग्रेस पार्टी की चूलें हिला दी। आज की पीढ़ी आपातकाल के बारे में सुनती जरूर है, लेकिन उस दौर में क्या घटित हुआ, इसका देश और तब की राजनीति पर क्या असर हुआ, इसके बारे में बहुत कम ही पता है तो आइए आज आपको बताते हैं कि तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला क्यों लिया था।

चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप

दरअसल, 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से सांसद चुनी गईं। इंदिरा के खिलाफ लड़े सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने उनपर ताबड़तोड़ 6 आरोप लगाए और इन सभी आरोपों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गए। राजनारायण के याचिका के मुताबिक इंदिरा गांधी ने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों को अपना चुनाव एजेंट बानाया। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी ने स्वामी अद्वैतानंद को बतौर रिश्वत 50 हजार रूपये दिए ताकि वो चुनाव लड़ें और राजनारायण का वोट कट सके।

क्या हुआ आपातकाल का असर

आपातकाल के दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था. तत्कालीन मीडिया पर अंकुश लगा दिया गया था. सभी विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करवाकर अज्ञात स्थानों पर रखा गया. सरकार ने मीसा (मैंटीनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत कदम उठाया. यह ऐसा कानून था जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत मांगने का भी अधिकार नहीं था. जबरन नसबंदी और तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चलवाने जैसी इमर्जेंसी की ज्यादतियां हुईं थीं।

…और फिर चली इंदिरा गांधी विरोधी लहर

आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज होती देख इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर 1977 में चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। खुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घटकर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फैसलों की जांच के लिए शाह आयोग गठित किया।

नई सरकार दो साल ही टिक पाई और अंदरुनी अंतर्विरोधों के कारण 1979 में सरकार गिर गई. उपप्रधानमंत्री चैधरी चरण सिंह ने कुछ मंत्रियों की दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया जो जनसंघ के भी सदस्य थे। इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन उनकी सरकार मात्र पांच महीने ही चल सकी. उनके नाम पर कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया। ढाई साल बाद हुए आम चुनाव में इन्दिरा गांधी फिर से जीत गईं।

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