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हरिद्वार कुंभ के दौरान कोरोना टेस्टिंग की जांच की आंच में फंसे सियासी सवाल

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एफएनएन, हरिद्वार : हरिद्वार कुंभ में कोराना टेस्टिंग का फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद जहां विपक्ष ने मौका गंवाए बगैर भाजपा सरकार को घेरने के प्रयास किए, वहीं भाजपा सरकार में भी विरोधाभास उभरे हैं। सरकार में हालिया नेतृत्व परिवर्तन के कारण कुंभ में हुई इस फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी को लेकर पलायनवादी रवैया भी दिखाई दे रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने श्रद्धालुओं की कोरोना जांच के लिए 23 निजी लैब से अनुबंध किया था। दिल्ली और हरियाणा की लैबोरेटरी भी इनमें शामिल थीं। हिसार (हरियाणा) की नलवा लैबोरेटरी और नई दिल्ली की डॉ. लालचंदानी लैब मैसर्स मैक्स कॉरपोरेट सर्विसेज के अधीन काम कर रही थीं। इन दोनों ही लैब पर आरोप है कि उन्होंने बिना सैंपल लिए ही फर्जी रिपोर्ट तैयार कर डाटा पोर्टल पर फीड कर दिया। जिनके मोबाइल पर इन लैब के कोरोना जांच रिपोर्ट के संदेश मिले, उन्होंने तो कभी सैंपल ही नहीं दिए और न हरिद्वार ही आए।

यह शिकायत जब आइसीएमआर तक पहुंची तो राज्य सरकार को जांच करने के निर्देश मिले। प्रारंभिक जांच में कोविड जांच घोटाले के आकार-प्रकार का पता चला। अब इस प्रकरण पर तीन-तीन जांच चल रही हैं, लेकिन तीनों जिला स्तरीय। जिला प्रशासन की जांच, स्वास्थ्य विभाग की जांच और एसआइटी जांच। जिला स्तरीय जांचों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। गड़बड़ी भी जिलास्तरीय अधिकारियों ने की और जांच भी उनके ही अधीनस्थ अधिकारियों को दी गई। खैर, शीशे में दिख रहे फर्जीवाड़े को दबाया तो नहीं जा सकेगा, लेकिन बड़े मगरमच्छों को कठघरे में करने पर कुछ शंकाएं जरूर उठ रही हैं।

राज्य में सात माह बाद विधानसभा चुनाव होने हैं तो विपक्ष यानी कांग्रेस ने तेजी से कोरोना टेस्टिंग में हुई गड़बड़ी को लपक लिया। सवाल उठे तो मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने बयान दिया गड़बड़ी कहां हुई, किसने की, पूरी जांच की जाएगी। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। वह यहीं नहीं रुके, बल्कि आगे बढ़े और कह बैठे कि गड़बड़ी उनके कार्यकाल की नहीं है। महज पिंड छुड़ाने के लिए दिया गया यह बयान जी का जंजाल बन गया। तीर अपनी ओर आते देख पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पलटवार जैसी सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह मुख्य्मंत्री से आग्रह करेंगे कि इसकी न्यायिक जांच कराएं, ताकि स्पष्ट हो सके कि गड़बड़ी किसके कार्यकाल में हुई। तेरे कार्यकाल बनाम मेरे कार्यकाल का प्रदर्शन करने वाली इस बयानबाजी से भाजपाई भी असहज हुए। विपक्ष ही नहीं प्रदेश की राजनीति में रुचि लेने वाले भी इस बयानबाजी की अपने-अपने नजरिये से समीक्षा कर रहे हैं।

कोरोना जांच घोटाला कब और कैसे हुआ, भाजपा के इन दिग्गजों को भले यह पता न हो, लेकिन आम जन को बखूबी मालूम है। सच तो यह है कि दोनों में से कोई भी पल्ला नहीं झाड़ सकता है। फर्जीवाड़ा को अंजाम देने वाली कंपनियों का चयन त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में हुआ और फर्जी कोरोना जांच तीरथ सिंह रावत के कार्यकाल में हुईं। दरअसल तीरथ सिंह रावत ने 10 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। जाहिर है कि महाकुंभ में तब तक कोरोना टेस्टिंग का ठेका उठ चुका था, लेकिन कोरोना टेस्टिंग का काम तो तीरथ सरकार के काल में ही हुआ। भाजपा के पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री ही इस गूढ़ रहस्य से पर्दा उठा सकते हैं कि इस सीधे-सादे तथ्य को जानने के लिए न्यायिक जांच की जरूरत क्यों आन पड़ी। तेरा कार्यकाल-मेरा कार्यकाल की लड़ाई लड़ रहे इन योद्धाओं को क्या यह नहीं मालूम कि तब भी भाजपा की सरकार थी और अब भी भाजपा की है।

सात माह बाद जब दोनों जनता की अदालत में जाएंगे तो क्या अपने-अपने कार्यकाल की बैलेंस शीट दिखाएंगे। वर्ष 2017 में जब राज्यवासियों ने भारी बहुमत से भाजपा प्रत्याशियों को सरकार बनाने के लिए चुना तो क्या ये दोनों कहीं सीन में थे। जनता को न तो त्रिवेंद्र का मुख्यमंत्री बनने का भान था और न ही ऐन चुनाव के मौके पर तीरथ सिंह रावत की ताजपोशी का अनुमान। नरेंद्र मोदी के करिश्मे से खिंचे वोटर तो तब भी चौंके जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने और अब भी चौंके जब उन्हें हटा कर तीरथ सिंह रावत ने सरकार की कमान संभाली। त्रिवेंद्र सरकार की एंटी इनकंबेंसी से निजात पाने के लिए अगर रणनीति के तहत त्रिवेंद्र कार्यकाल और तीरथ कार्यकाल का बंटवारा किया जा रहा है तो शायद यह उत्तराखंडवासियों के गले न उतरे। लोग तो यही कह रहे हैं कि उन्होंने मोदी के कहने पर पांच साल के लिए भाजपा सरकार को चुना और जो हुआ और जो नहीं हुआ उसके नंबर तो भाजपा के खाते में ही दर्ज करेंगे।

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