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अहंकार का अंकुर फूटते ही उखाड़ डालते हैं भक्तवत्सल श्रीविष्णु

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*खिरका में आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ जी की संगीतमय साप्ताहिक श्रीराम कथा के दूसरे दिवस के सायं सत्र में भी हुई आनंददायी भगवत्चर्चा*

फ्रंट न्यूज नेटवर्क, फतेहगंज पश्चिमी-बरेली। नैमिषारण्य धाम से आए प्रसिद्ध कथाव्यास आचार्य अवध किशोर शास्त्री सरस’ ने समझाया-“श्रीहरि विष्णु अपने परम भक्तों के हृदय में अहंकार का अंकुर फूटते ही उसे जड़ से उखाड़ डालते हैं।”

कथाव्यास श्री ‘सरस’ जी ग्राम खिरका जगतपुर में मटरूलाल लालीदेवी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी सूबेदार मेजर वीरेंद्र पाल सिंह (सेवानिवृत्त) के आयोजकत्व में संगीतमय साप्ताहिक श्रीरामकथा के दूसरे दिवस सोमवार के सायं सत्र में बड़ी संख्या में उमड़े श्रद्धालु महिला-पुरुषों के बीच नारद मोह की प्रेरणादायी कथा बांच रहे थे।

उन्होंने समझाया-अहंकारी व्यक्ति गुरुजनों के चेताने-बरजने पर भी अपनी अहंकारी प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाता और अपना समूल नाश कर बैठता है। लेकिन, ईश्वर अपने परम भक्तों को अहंकारी बनने ही नहीं देते और अहंकार का नाश कर उसे सद्मार्ग पर लगा ही देते हैं।

कथाव्यास कहते हैं-कामदेव को भी जीत लेने का दंभ पालने वाले देवर्षि नारद भगवान की मोहमाया के वशीभूत होकर विश्वमोहिनी का वरण करने के लिए श्री हरि से उन्हीं का स्वरूप मांग बैठते हैं।

नारद कहते हैं-“आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भांति नहिं पावौं ओही।” लेकिन साथ में यह भी बोल देते हैं-“जेहि विधि नाथ होहि हित मोरा। करहु सो बेग दास मैं तोरा।” और भक्तों के परम हितैषी श्री हरि संकल्प कर लेते हैं-“जेहि विधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु वचन न मृषा हमार।”

कथाव्यास बताते हैं-“विश्व मोहिनी का वरण कर ले जा रहे श्री नारायण को रास्ते में रोककर क्रोध-प्रमादवश नारद उन्हें अपशब्द कहते और शाप दे देते हैं किंतु प्रभु प्रेरित माया का आवरण छंटते ही दुख-पश्चात्ताप के महासमुद्र में डूब जाते हैं। तब भक्तवत्सल भगवान समझाते हैं कि देवकार्य साधने और असुरों के विनाश हेतु यह सब कुछ मेरी इच्छा से ही हुआ है, तुम्हारा तनिक भी दोष नहीं है। अब मन की शांति के लिए “जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत विश्रामा।”

आरती-प्रसाद वितरण के उपरांत कथासत्र को विश्राम दिया गया। मुख्य यजमान नत्थूलाल पुजेरी, पूर्व प्रधान कृष्णपाल गंगवार, पत्रकार-कवि गणेश ‘पथिक’, बनवारीलाल यदुवंशी, अरविंद गंगवार, हरिशंकर गंगवार, मोहनस्वरूप, दिनेश गंगवार आदि समेत गांव और आसपास के सैकड़ों महिला-पुरुष श्रद्धालु पूरे समय कथाव्यास के साथ श्रीराम की महिमा सुनकर झूमते और तालियां बजाकर कीर्तन करते रहे।

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