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केदारनाथ धाम में सुरक्षा पर सवाल, रूप छड़ गायब होने से बढ़ी चिंता

एफएनएन, देहरादून: केदारनाथ धाम में अत्यधिक धार्मिक महत्व रखने वाली बाबा केदार की रूप छड़ अभी बदरी केदार मंदिर समिती (बीकेटीसी) के पास मौजूद नही है. इस लापरवाही को लेकर सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं. इस सबंध में मंदिर समिती ने चुप्पी साध रखी है. पंडा पुरोहितों का कहना है कि रूप छड़ एक तरह से बाबा केदारनाथ का ही स्वरुप है और इसको लेकर लापरवाही एक बड़ी बात है. हालांकि इसमें बीकेटीसी के तरफ से जारी एक पत्र के सामने आने के बाद मामला स्पष्ट हो गया है.

देवभूमि के देवस्थल और धार्मिक प्रतीकों का विशेष महत्व: देवभूमि उत्तराखंड में अपने चारों धाम, यहां की देव संस्कृति और देव परंपरा के लिए सनातन धर्म में विशेष स्थान रखते हैं. यहां की पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक प्रतीक, चारों धामों की पूजा पद्धतियां पूरे भारत देश और सनातन धर्म के कर्मकांडों को लेकर पथ प्रदर्शक का काम करती हैं. ऐसा ही एक विशेष प्रतीक है केदारनाथ धाम में चल विग्रह डोली के साथ चलने वाला धर्म दंड का, जिसे स्थानीय भाषा में रूप छड़ भी कहा जाता है. इस धर्म दंड (रूप छड़) की केदारनाथ धाम में विशेष मान्यता है.

Kedarnath dharm dand

जानकार और पंडा पुरोहित का कहना है कि बाबा केदारनाथ धाम के दर्शन करना या फिर इस धर्म दंड (रूप छड़) का दर्शन करना, दोनों एक बराबर पुण्य देते हैं. यानी केदार बाबा का यह धर्म दंड (रूप छड़) बाबा केदार का ही एक स्वरूप माना जाता है.

Kedarnath Dharma Danda

केदारनाथ के धार्मिक प्रतीक भगवान केदार की निजी संपत्ति: केदारनाथ धाम में केवल धर्म दंड ही नहीं, इसके अलावा और भी कई ऐसी धार्मिक प्रतीक हैं, जिनकी पौराणिक मान्यता है. केदारनाथ और बदरीनाथ धाम में भगवान से जुड़े जो भी धार्मिक प्रतीक या फिर पूजनीय सामग्री है, इन्हें उसी भगवान या फिर उसी धाम की निजी संपत्ति माना गया है. हालांकि, पूजा और अनुष्ठान के दौरान परंपराओं के तहत रावल और अन्य पुजारी इन धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं. इन सभी धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी बदरी केदार मंदिर समिति की है. माना जाता है कि यह सभी धार्मिक प्रतीक भगवान की निजी संपत्ति हैं. इन्हें किसी दूसरी जगह पर अन्य किसी प्रयोजन के लिए नहीं ले जाया जा सकता है.

Kedarnath Dharma Danda

केदारनाथ से गायब हो गया था धर्म दंड (रूप छड़): हाल ही में केदारनाथ धाम का विशेष धार्मिक महत्व वाला धर्म दंड (रूप छड़) जब भंडार गृह में प्राप्त नहीं हुआ तो इसको लेकर हड़कंप मच गया. चांदी के इस बेशकीमती धर्म दंड (रूप छड़) को लेकर धर्मस्य विभागीय मंत्री सतपाल महाराज ने सख्त आपत्ति दर्ज की. उन्होंने कहा कि बीकेटीसी कि यह जिम्मेदारी है कि वह केदारनाथ धाम के सभी धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षित अपने अपनी कस्टडी में रखें. धर्म दंड बेहद महत्वपूर्ण होता है. इसे इस तरह से कहीं गायब नहीं होना चाहिए. धर्म दंड यहां से कहीं दूसरी जगह पर नहीं जाता है. उनके द्वारा इस संबंध में जांच की जा रही है. पूरी पड़ताल की जाएगी कि आखिर यह कहां गया और कैसे गया है?-सतपाल महाराज, धर्मस्य विभागीय मंत्री-

आखिर कहां गई बाबा केदार की बेशकीमती रूप छड़: बदरी-केदार मंदिर समिति जिसकी जिम्मेदारी है कि वह अपने अधीन सभी मंदिरों की संपत्तियों को सुरक्षित अपने कब्जे में रखेगी, लेकिन केदारनाथ धाम के धर्म दंड के गायब होने के बाद जब हड़कंप मचा तो मालूम हुआ कि केदारनाथ धाम के मुख्य रावल भीमाशंकर लिंग द्वारा महाराष्ट्र के नांदेड़ में पट्टा अभिषेक रजत महोत्सव में प्रतिभाग किए जाने के क्रम में उनके द्वारा रूप छड़ को भेजा गया था. जिसकी अनुमति बदरी केदार मंदिर समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय थपलियाल ने 19 जनवरी 2026 को दी थी. तभी से रूप छड़ गायब है.

जानकार कहते हैं कि यह रावल का एक निजी कार्यक्रम था. इसमें भगवान केदारनाथ के प्रतीकों को ले जाने की अनुमति नहीं है. यही नहीं, साल 2000 का एक पत्र भी सामने आया जहां पर इसी तरह से रावल द्वारा भगवान केदारनाथ के बेशकीमती प्रतीक चिन्हों को दक्षिण भारत ले जाने की अनुमति मांगी गई थी. लेकिन उस समय तत्कालीन मंदिर समिति प्रशासन द्वारा इस पर रोक लगा दी गई थी. उस समय इस अनुमति को स्पष्ट तौर पर यह कहकर रद्द किया गया था कि एसी ना तो कोई परंपरा है और ना ही दस्तूर.

दरअसल, केदारनाथ और बदरीनाथ में भगवान के प्रतीकों को कपाट बंद होने के बाद बीकेटीसी के खजाने में सुरक्षित रखने का प्रावधान है. इन्हें कहीं भी बाहर ले जाने की अनुमति नहीं है. साल 2000 में भी इस तरह की कोई अनुमति नहीं दी गई थी. नियम यह है कि जब कपाट बंद होते हैं तो सभी प्रतीकों को बदरी केदार मंदिर समिति अपने कब्जे में असुरक्षित रख लेती है.

केदारनाथ धाम के पुरोहित प्रवीन तिवारी का कहना है कि, रावल जी द्वारा महाराष्ट्र में धर्म दंड (रूप छड़) ले जाने की जानकारी सामने आई है. ये जानकारी बीकेटीसी के संज्ञान में नहीं थी. इस कारण ये मामला चर्चा का विषय बना है. हालांकि, धर्म दंड वापस आई गई है. गुम होना या चोरी होने की ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन बिना बीकेटेसी के अनुमति के धर्म दंड को ले जाना, यह कदम नहीं उठाया जा सकता है. फिलहाल धर्म दंड उत्तराखंड में है और सुरक्षित है.-प्रवीन तिवारी, पुरोहित, केदारनाथ धाम-

मदिर समिति ने साधी चुप्पी: 19 जनवरी 2026 को बदरी-केदार मंदिर समिति के कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) विजय थपलियाल द्वारा रावल को दी गई धर्म दंड ले जाने की अनुमति के बाद बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी और सीईओ ने चुप्पी साध ली है. दोनों से ही कई बार मामले की स्पष्टीकरण को लेकर संपर्क साधने की कोशिश की गई. लेकिन दोनों ने ही मीडिया से दूरी बना ली है.

इस मामले पर कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी का भी बयान सामने आया है. उन्होंने कहा कि, 19 जनवरी को केदारनाथ धाम के मुख्य रावल अपने एक निजी कार्यक्रम में धर्म दंड को महाराष्ट्र ले गए. जबकि चारधामों की ऐसी कोई परंपरा नहीं है कि वहां धार्मिक प्रतीकों के साथ छेड़छाड़ की जाए. ऐसे में ये बड़ा सवाल है कि बीकेटीसी के वरिष्ठ पदाधिकारी को ये अनुमति प्रदान करने का आदेश किसने दिया और क्यों दिया? ऐसे में बीकेटीसी की चुप्पी बताती है हेमंत द्विवेदी की नेतृत्व में समिति में सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है. गरिमा दसौनी, कांग्रेस प्रवक्ता

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