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‘शर्माजी’ बनकर छह साल से बेंगलुरु में रह रही थी पाकिस्तानी फेमिली, हुई गिरफ्तार

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एफएनएन ब्यूरो, नई दिल्ली/बेंगलुरु। कर्नाटक पुलिस ने खुफिया एजेंसियों से मिले इन्पुट्स के आधार पर पिछले छह साल से ‘शर्माजी’ बनकर रह रहे चार पाकिस्तानियों को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया है। पकड़े गए पाक नागरिकों के कब्जे से फर्जी भारतीय पासपोर्ट और जाली आधार कार्ड भी बरामद किए गए हैं।

बेंगलुरु पुलिस ने बताया कि पकड़ा गया पाक नागरिक 48 वर्षीय राशिद अली सिद्दीकी, अपनी 38 साल की पत्नी आयशा और उसके माता-पिता 78 वर्षीय हनीफ मोहम्मद और 61 साल की रुबीना के साथ बेंगलुरु के राजापुरा गांव में पहचान बदलकर क्रमश: शंकर शर्मा, आशा रानी, रामबाबू शर्मा और रानी शर्मा के नाम से रह रहा था।

छापे की भनक लगने पर भागने की तैयारी में थे चारों

पुलिस गिरफ्तारी के लिए पहुंची तो पाक नागरिक सिद्दीकी और उसके परिवार को छापे की भनक लग चुकी थी और चारों निकल भागने की तैयारी में पैकिंग ही कर रहे थे। पूछताछ में सिद्दीकी ने खुद को शर्मा बताया और कहा कि चीरों लोग वर्ष 2018 से शर्माजी फेमिली बनकर बेंगलुरु में रह रहे हैं। जांच के दौरान इस परिवार के जाली भारतीय पासपोर्ट और आधार कार्ड भी सामने आए पेश किए, जिनमें इनकी हिंदू पहचान दर्ज है। पुलिस को इनके मकान की अंदरुनी दीवार पर ‘मेंहदी फाउंडेशन इंटरनेशनल जश्न-ए-यूनुस’ लिखा मिला। साथ ही घर में कुछ मौलवियों की भी तस्वीरें थीं।

चारों ने कबूला पाकिस्तानी होने का सच

पुलिस पूछताछ में सिद्दीकी उर्फ शंकर शर्मा ने माना कि वे पाकिस्तान के लियाकताबाद से हैं। वहीं, उनकी पत्नी और उनका परिवार लाहौर से है। उन्होंने बताया कि आयशा से साल 2011 में एक ऑनलाइन समारोह में शादी की थी। तब वह बांग्लादेश में अपने परिवार के साथ थीं। सिद्दीकी ने बताया कि अपने ही देश में उत्पीड़न के बाद पाकिस्तान से बांग्लादेश शिफ्ट होना पड़ा।

बांग्लादेश से मालदा के रास्ते घुसे थे भारत में

एफआईआर के मुताबिक, सिद्दीकी उपदेशक बनकर बांग्लादेश शिफ्ट हुआ था। साल 2014 में उसे बांग्लादेश में भी निशाना बनाया जाने लगा। इसके बाद उसने भारत में मेंहदी फाउंडेशन के परवेज नाम के सदस्य से संपर्क साधा और अवैध रूप से भारत में शिफ्ट हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्दीकी, अपनी पत्नी और उनके माता-पिता जैनबी नूर और मोहम्मद यासीन बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल के मालदा के रास्ते पहुंचे थे। यहां उनकी कुछ एजेंट्स ने मदद की थी।

शुरुआत में दिल्ली में भी रहे चारों
अखबार ने पुलिस अधिकारी के हवाले से लिखा कि परिवार शुरुआत में दिल्ली में भी रहा और डुप्लीकेट आधार कार्ड, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस हासिल कर लिए। साल 2018 में नेपाल दौरे पर सिद्दीकी की मुलाकात बेंगलुरु के रहने वाले वाशिम और अल्ताफ से हुई और उनकी मदद से बेंगलुरु में शिफ्ट हो गए।

वक्त पर अदा करता था मकान का किराया

बताते हैं कि अल्ताफ मकान का किराया हर महीने वक्त पर अदा करता था। मेंहदी फाउंडेशन उसे रुपये देता था। सिद्दीकी गैरेज में ऑयल की सप्लाई करता था और खाने की चीजें भी बेचता था।

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