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Cyclone और अल नीनो का दोहरा खतरा: बेमौसम बारिश से फसलें तबाह, किसानों के साथ देश की खाद्य सुरक्षा पर संकट

एफएनएन , नई दिल्ली : देश के कई राज्यों में लगातार चक्रवाती गतिविधियों और बेमौसम बारिश ने खेती-किसानी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। चक्रवात ‘अर्नब’ का असर कम होने के बाद बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवात ‘मुरसु’ ने भी कई इलाकों में तेज हवाओं और भारी बारिश से जनजीवन प्रभावित किया। मौसम के इस बदलते मिजाज ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों की नजर अल नीनो (El Niño) के संभावित प्रभावों पर भी है, जिससे आने वाले समय में मौसम की अनिश्चितता और बढ़ सकती है।

लगातार बदलते मौसम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका भारतीय कृषि व्यवस्था और देश की खाद्य सुरक्षा पर कितना असर पड़ेगा। धान की तैयार फसल को नुकसान, रबी की बुवाई में देरी और सब्जियों की खेती प्रभावित होने से किसानों के सामने आर्थिक संकट गहराने की आशंका है।

चक्रवात अर्नब से कई राज्यों में खेती को नुकसान

चक्रवात ‘अर्नब’ ने 120 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार वाली हवाओं के साथ पूर्वी तट के कई हिस्सों में तबाही मचाई। आंध्र प्रदेश और ओडिशा इससे सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल रहे। इसके अलावा छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, झारखंड और तेलंगाना में भी तेज हवाओं के साथ बेमौसम बारिश हुई। बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इसका असर देखने को मिला।

चक्रवात के कारण खेतों में खड़ी फसलों के साथ कृषि से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा। आंध्र प्रदेश ने नुकसान की भरपाई के लिए 4,600 करोड़ रुपये से अधिक के मुआवजे की मांग की है। इसमें बड़ी राशि कृषि और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की भरपाई के लिए प्रस्तावित है।

वहीं, ओडिशा के शुरुआती कृषि सर्वेक्षण में 90 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि प्रभावित होने की बात सामने आई है। छत्तीसगढ़ में नुकसान का आकलन जारी है, लेकिन शुरुआती रिपोर्टों में 50 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर फसल प्रभावित होने का संकेत मिला है। झारखंड में भी धान और रागी की फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें हैं।

धान की फसल पर सबसे ज्यादा मार

प्रभावित राज्यों में धान की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा है। तेज हवाओं के कारण खेतों में खड़ी फसलें जमीन पर गिर गईं। कृषि क्षेत्र में इसे फसल का बिछना कहा जाता है। इससे कटाई करना मुश्किल हो जाता है और अनाज की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

चक्रवात के आने का समय भी किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हुआ। आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कई इलाकों में धान की फसल पकने के अंतिम चरण में थी और कुछ जगहों पर कटाई की तैयारी चल रही थी। ऐसे में भारी बारिश ने खेतों में जलभराव कर दिया। इससे पके हुए धान के सड़ने और फसल में कीट तथा फंगस से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ गया।

खेतों में काटकर रखी गई धान की फसल भी बारिश से प्रभावित हुई। कई जगह अनाज खुले खेतों में पड़ा था, जो भीगने के कारण खराब हो सकता है। नुकसान का असर केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। समुद्र से दूर प्रयागराज जैसे भीतरी इलाकों में भी धान की फसल प्रभावित होने की खबरें सामने आईं। इसके अलावा कई जिलों में तापमान में अचानक 6 से 8 डिग्री सेल्सियस तक गिरावट दर्ज की गई।

रबी की बुवाई पर भी मंडराया संकट

धान की फसल के बाद अब किसानों की सबसे बड़ी चिंता रबी की बुवाई को लेकर है। देश के बड़े कृषि क्षेत्रों में सरसों, दलहन, तिलहन और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इन फसलों की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी में नमी का संतुलित स्तर और खेतों में पानी की उचित निकासी जरूरी होती है।

चक्रवात के कारण हुई भारी बारिश से कई इलाकों में मिट्टी में जरूरत से ज्यादा नमी हो गई है। तेज हवाओं और जलभराव के चलते खेतों की तैयारी प्रभावित हुई है, जिससे रबी की बुवाई में देरी होने की आशंका है।

जिन किसानों ने सरसों की बुवाई कर दी है, उनकी फसल पर भी खतरा मंडरा रहा है। खेतों में अधिक पानी जमा होने से बीजों का अंकुरण प्रभावित हो सकता है और पौधों का शुरुआती विकास रुक सकता है। इसके अलावा जलभराव से मिट्टी में कीट और रोग फैलाने वाले जीवों के पनपने की संभावना बढ़ जाती है।

खाद और दोबारा बुवाई का बढ़ सकता है खर्च

लगातार बारिश का असर मिट्टी की उर्वरता पर भी पड़ सकता है। भारी बारिश के दौरान नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व पानी के साथ बह सकते हैं। इससे फसलों को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता और किसानों को अतिरिक्त खाद का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

कुछ प्रभावित क्षेत्रों में खेतों की स्थिति ऐसी हो सकती है कि किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़े। इससे बीज, खाद, मजदूरी और खेत तैयार करने पर अतिरिक्त खर्च आएगा। पहले से नुकसान झेल रहे किसानों पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।

सब्जी उत्पादकों की मुश्किलें भी बढ़ीं

चक्रवात और बेमौसम बारिश से सब्जियों की खेती करने वाले किसानों को भी नुकसान उठाना पड़ा है। कई इलाकों में सर्दियों की सब्जियों की बुवाई प्रभावित हुई है, जबकि पहले से खेतों में लगी फसलें भी बारिश और तेज हवाओं की चपेट में आई हैं।

चक्रवात ‘अर्नब’ के बाद ‘मुरसु’ के असर ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी। दक्षिण-पूर्वी तट पर बारिश और तेज हवाओं के साथ इसका प्रभाव दूर-दराज के भीतरी इलाकों तक पहुंचा। इससे धान और अन्य खड़ी फसलों को दोबारा नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो गई है।

लगातार दो चक्रवाती घटनाओं ने खेती के पूरे कैलेंडर को प्रभावित कर दिया है। किसान एक ओर खराब हुई फसल से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अगली फसल की तैयारी भी समय पर नहीं कर पा रहे हैं।

खाद्य पदार्थों की कीमतों पर बढ़ सकता है दबाव

फसलों को नुकसान का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव बाजार और आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ सकता है। चावल, सरसों और सब्जियों की कीमतें पहले से ही ऊंचे स्तर पर थीं। ऐसे में उत्पादन घटने की आशंका से खाद्य पदार्थों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।

अल नीनो को लेकर बनी चिंता और कृषि उत्पादन में संभावित गिरावट के बीच कुछ बाजार व्यापारियों द्वारा चावल का स्टॉक जमा करने की खबरें भी सामने आई थीं। इससे बाजार में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है।

तिलहन उत्पादन भी चिंता का विषय बना हुआ है। मानसून के दौरान अत्यधिक बारिश से तिल की फसल प्रभावित होने की बात कही गई है। ऐसे में कई किसान वैकल्पिक आय के लिए सरसों की खेती पर निर्भर हैं। लेकिन सर्दियों में सामान्य से अधिक बारिश होने पर सरसों की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है।

इस स्थिति में किसानों को कम उत्पादन और खेती की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ सकता है, जबकि आम उपभोक्ताओं के लिए खाद्य सामग्री महंगी होने का खतरा रहेगा।

चक्रवात से बचाव के लिए मैंग्रोव जंगल जरूरी

मौसम की मार को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन सरकारें और प्रशासन ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिनसे नुकसान कम किया जा सके। इसके लिए तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव जंगलों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मैंग्रोव पेड़ समुद्री लहरों और तूफानों के प्रभाव को कम करने में प्राकृतिक सुरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं। इनकी फैली हुई जड़ें तटीय मिट्टी को बांधकर रखती हैं और समुद्री कटाव को रोकने में मदद करती हैं। इसलिए पहले से मौजूद मैंग्रोव जंगलों का संरक्षण और नष्ट हो चुके क्षेत्रों में दोबारा पौधरोपण तटीय आपदा प्रबंधन का अहम हिस्सा होना चाहिए।

किसानों के लिए बीज और खाद के सुरक्षित भंडार बनाने की जरूरत

चक्रवात प्रभावित राज्यों और संवेदनशील तटीय जिलों में बीज तथा खाद के सुरक्षित भंडार तैयार किए जाने की जरूरत है। प्राकृतिक आपदा में फसल बर्बाद होने के बाद किसानों को दोबारा बुवाई के लिए तुरंत कृषि सामग्री उपलब्ध कराई जा सकेगी।

इन भंडारों में जल्दी और देर से पकने वाली दोनों तरह की फसलों के बीज रखे जाने चाहिए। इसके साथ ही स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुकूल पारंपरिक फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना भी जरूरी है। इससे मौसम में बदलाव होने पर किसान अपनी बुवाई का समय और फसल का चुनाव बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

जैविक खाद और खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने पर जोर

खेती में रासायनिक खाद और अन्य कृषि सामग्री की बढ़ती कीमतों के बीच गांवों में जैविक खाद और केंचुआ खाद तैयार करने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। ग्राम स्तर पर खाद बनाने की सुविधाएं और किसान सहकारी समितियां किसानों की बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम कर सकती हैं। इससे मिट्टी की गुणवत्ता और उपजाऊ क्षमता को भी बेहतर बनाया जा सकता है।

इसके अलावा किसानों को खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पेड़ तेज हवाओं की रफ्तार कम करने में मदद करते हैं, जिससे फसलों के जमीन पर गिरने और मिट्टी के कटाव का खतरा घट सकता है। पेड़ों से फल, लकड़ी और अन्य उत्पादों के जरिए किसानों को अतिरिक्त आमदनी का अवसर भी मिल सकता है।

गांवों में मजबूत जल निकासी व्यवस्था की जरूरत

भारी बारिश के दौरान खेतों में जलभराव फसलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले कारणों में से एक है। इससे बचने के लिए गांवों में जल प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी।

संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में जल निकासी का मजबूत ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, ताकि बारिश का अतिरिक्त पानी खेतों से निकालकर तालाबों, जलाशयों और अन्य जल संग्रहण संरचनाओं तक पहुंचाया जा सके। इससे खेतों में लंबे समय तक पानी जमा होने से बचाव होगा। साथ ही, बारिश के पानी को सुरक्षित रखकर सूखे के समय सिंचाई में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

मौसम की सही जानकारी किसानों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती

इन प्राकृतिक आपदाओं ने कृषि व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी भी उजागर की है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान और किसानों तक पहुंचने वाली वास्तविक समय की जानकारी के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।

किसानों को अपने क्षेत्र के अनुसार बारिश, तेज हवाओं, फसल की बुवाई, कटाई और बीमारियों से बचाव से जुड़ी सटीक जानकारी समय पर मिलनी चाहिए। इसके लिए मौसम पूर्वानुमान, कृषि परामर्श सेवाओं और ग्रामीण सूचना नेटवर्क को मजबूत करना जरूरी है।

हर कृषि-जलवायु क्षेत्र के लिए वहां की फसलों और स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक अलग सलाह तैयार की जानी चाहिए। ग्राम पंचायतों और गांव स्तर की संस्थाओं के माध्यम से यह जानकारी किसानों तक पहुंचाई जा सकती है। मोबाइल मैसेज और व्हाट्सएप अलर्ट भी इसमें उपयोगी साबित हो सकते हैं।

फिलहाल कई किसान इस उलझन में हैं कि रबी की फसलों की बुवाई कब करें और लगातार आ रहे चक्रवातों से अपने खेतों को कैसे बचाएं। पर्याप्त और भरोसेमंद जानकारी नहीं मिलने पर उन्हें अनुमान या दूसरे किसानों से मिली सलाह के आधार पर फैसले लेने पड़ते हैं। इससे आने वाले महीनों में कृषि उत्पादन प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।

खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि व्यवस्था को बनाना होगा मजबूत

चक्रवात, बेमौसम बारिश और मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव अब केवल कभी-कभार आने वाली प्राकृतिक आपदाएं नहीं रह गए हैं। ये खेती-किसानी और अर्थव्यवस्था के लिए लगातार बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।

भारत में करोड़ों किसान बुवाई, सिंचाई, कटाई और फसल बेचने से जुड़े फैसलों के लिए मौसम के पारंपरिक चक्र पर निर्भर रहते हैं। चक्रवातों या अल नीनो जैसी जलवायु परिस्थितियों को नियंत्रित करना संभव नहीं है, लेकिन इनके प्रभाव को कम करने के लिए तैयारी जरूर की जा सकती है।

इसके लिए केवल आपदा के बाद राहत और मुआवजा देने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। खेती को लंबे समय तक सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए मैंग्रोव संरक्षण, जलवायु अनुकूल बीज, गांवों में जल निकासी, जैविक खाद और सटीक मौसम पूर्वानुमान जैसी व्यवस्थाओं में निवेश करना होगा।

आखिरकार, खाद्य सुरक्षा का मतलब केवल देश में पर्याप्त अनाज पैदा करना नहीं है। इसका असली अर्थ यह भी है कि मौसम का मिजाज बदलने और प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी देश की कृषि व्यवस्था उत्पादन जारी रखने और किसानों की आजीविका सुरक्षित रखने में कितनी सक्षम है।

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