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हजारों शिक्षकों ने देहरादून में मुख्यमंत्री आवास कूच कर अपनी ताकत का अहसास कराया और प्रधानमंत्री को अपने खून से लिखे 20 हजार पत्र

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एफएनएन, देहरादून : उत्तराखंड में राजकीय शिक्षक संघ से जुड़े करीब 25 हजार से ज्यादा शिक्षक आंदोलन की राह पर हैं. हालांकि अभी तक शिक्षकों ने शैक्षणिक कार्य पूरी तरह त्यागा नहीं है. लेकिन आंदोलन जिस दिशा में बढ़ रहा है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बड़ा बिगुल फूंकने की तैयारी है.

हाल ही में हजारों शिक्षकों ने देहरादून में मुख्यमंत्री आवास कूच कर अपनी ताकत का अहसास कराया था. तेज बारिश और कई जगहों पर सड़कें टूटी होने के बावजूद प्रदेशभर से शिक्षक राजधानी तक पहुंचे. बड़ी संख्या में जुटे इस प्रदर्शन ने सरकार को शिक्षकों के तेवरों का एहसास करा दिया है.

खास बात यह है कि अभी आंदोलन खत्म नहीं हुआ है. यह तब है जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लेकर शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत भी शिक्षकों से बात कर चुके हैं. हालांकि, इस बातचीत के बाद शिक्षकों ने कुछ दिन मांगे पूरी करने का समय सरकार को जरूर दे दिया है.

राज्य में शिक्षकों की तीन प्रमुख मांगें: शिक्षकों ने आंदोलन के लिए तीन सूत्रीय मांगों को आधार बनाया है. इनमें प्रधानाचार्य पद पर सीधी भर्ती को रद्द करना, शिक्षकों के प्रमोशन का रास्ता खोलना और तबादला प्रक्रिया शुरू करना शामिल है. शिक्षक नेताओं का कहना है कि यह मांगें नई नहीं है. बल्कि सालों से इन मुद्दों को लेकर शिक्षक संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है.

संघ के प्रदेश अध्यक्ष की चेतावनी: राजकीय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राम सिंह चौहान ने आंदोलन की रूप रेखा स्पष्ट करते हुए कहा कि अब आगे 20 हजार से ज्यादा पत्र प्रधानमंत्री को शिक्षक अपने खून से लिखकर देंगे. इसके बाद शिक्षा मंत्री के आवास का घेराव किया जाएगा और फिर आमरण अनशन की ओर आंदोलन बढ़ेगा. यदि तब भी बात नहीं बनी तो सामूहिक आत्मदाह जैसे कदम उठाने पर भी मजबूर हो सकते हैं. हालांकि, राजकीय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राम सिंह चौहान ने मांगें पूरी करने के लिए सरकार को समय देने की बात कही और इसके बाद भी सकारात्मक निर्णय नहीं होने पर आंदोलन को आगे बढ़ाने की तरफ भी इशारा कर दिया.

30 हजार सदस्य और बढ़ती ताकत: राजकीय शिक्षक संघ के तहत राज्यभर में करीब 30 हजार शिक्षक सदस्य हैं. इस वजह से आंदोलन सरकार के लिए मुश्किल भरा हो सकता है. संघ का मानना है कि शिक्षकों के प्रमोशन और तबादले के मुद्दे पर सरकार लगातार उदासीन रवैया अपना रही है.

वरिष्ठ पत्रकार की राय: वरिष्ठ पत्रकार भगीरथ शर्मा कहते हैं कि प्रमोशन को लेकर सरकार का रवैया गलत दिखाई देता है. शिक्षक, समाज के सम्मानित वर्ग से आते हैं और उनकी बातें अनसुनी करना राजनीतिक दृष्टि से भी भारी पड़ सकता है. जिस तरह प्रदेश में शिक्षकों की बड़ी संख्या है, वह सत्ताधारी दलों को सोचने पर मजबूर कर देती है.भगीरथ शर्मा कहते हैं कि इन स्थितियों में सबसे ज्यादा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है और शैक्षणिक कार्य भी प्रभावित होते हैं. इसलिए सरकार को इस पर जल्द से जल्द निर्णय लेना होगा.

शिक्षा मंत्री का पक्ष: इससे पहले शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने शिक्षकों की मांगों पर सफाई दी थी. उनका कहना है, ‘मैं शिक्षकों का सम्मान करता हूं, लेकिन प्रमोशन से जुड़े मामले हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं. यही वजह है कि सरकार अभी प्रमोशन नहीं कर पा रही है. राज्य सरकार कोर्ट में एसएलपी दायर करने पर विचार कर रही है, ताकि शिक्षकों को प्रमोशन का रास्ता मिल सके’.

प्रधानाचार्य पद पर विवाद: राज्य में प्रधानाचार्य के करीब 1300 पद हैं. सरकार इनमें से 650 पदों पर सीधी भर्ती कराने का प्रस्ताव लाई है. जबकि शिक्षक संघ इस भर्ती को रद्द कर प्रमोशन के आधार पर पद भरने की मांग कर रहा है. शिक्षकों का कहना है कि सरकार का यह फैसला उनके करियर ग्रोथ को प्रभावित करेगा.

प्रमोशन और तबादले पर आक्रोश: प्रदेश में 2018 के बाद से सहायक अध्यापकों को लेक्चरार पद पर प्रमोशन नहीं दिया गया है. वहीं 2021 से हेड मास्टर और प्रिंसिपल पद पर भी प्रमोशन रुके हुए हैं. इसके अलावा इस बार ट्रांसफर सीजन के दौरान भी शिक्षकों के तबादले नहीं किए गए, जिससे आक्रोश और गहराया है. यही वजह है कि अब शिक्षक तबादला प्रक्रिया खोलने की मांग को लेकर भी आंदोलित हैं.

बच्चों की पढ़ाई पर असर: भले ही शिक्षक अभी शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं, लेकिन आंदोलन की वजह से पढ़ाई पर असर पड़ रहा है. उधर जब तक शिक्षकों की मांगें पूरी नहीं होती, तब तक उनका ध्यान पढ़ाई पर पूरी तरह होना मुमकिन नहीं है. इसका सीधा नुकसान बच्चों को झेलना पड़ रहा है.

2016 जैसा बड़ा आंदोलन आया याद: यह पहला मौका नहीं है जब राज्य में शिक्षक इतने बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं. साल 2016 में भी शिक्षकों ने हड़ताल का रास्ता अपनाया था. तब तत्कालीन हरीश रावत सरकार को झुकना पड़ा था. उस आंदोलन के बाद सरकार ने शिक्षकों को प्रमोशन दिए थे और साल में तीन विशेष अवकाश की सुविधा भी दी थी.

सरकार के लिए बढ़ती चुनौती: अगर यह आंदोलन लंबा खिंचता है तो इसका असर न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि राजनीति पर भी दिखेगा. शिक्षकों की बड़ी संख्या और समाज में उनका सम्मानजनक स्थान सरकार के लिए दबाव की स्थिति पैदा कर सकता है. ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है. एक ओर शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त रखना और दूसरी ओर शिक्षकों की नाराजगी को शांत करना है.

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