– टिकट कटने के बाद जिन्हें चुका हुआ सियासी चेहरा समझा जा रहा था
– भाजपा ओबीसी मोर्चा ने उन्हीं सुशील यादव को सौंपी प्रदेश सोशल मीडिया सह-संयोजक की कमान
एफएनएन, रुद्रपुर : Political में किसी को कमजोर समझ लेना और उसकी राजनीतिक पारी खत्म मान लेना कई बार भारी पड़ जाता है। रुद्रपुर की राजनीति में सुशील यादव की नई नियुक्ति कुछ ऐसा ही संदेश दे रही है। नगर निगम चुनाव में टिकट कटने के बाद जिनकी राजनीतिक संभावनाओं पर सवाल उठाए जा रहे थे, उन्हें भाजपा ओबीसी मोर्चा उत्तराखंड में प्रदेश सोशल मीडिया सह-संयोजक की जिम्मेदारी सौंपकर संगठन ने एक बार फिर उनकी उपयोगिता पर भरोसा जताया है। इस फैसले ने स्थानीय सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
टिकट कटा, हौसले नहीं; अब प्रदेश स्तर पर नई जिम्मेदारी!
भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नेत्रपाल मौर्य ने 17 अक्टूबर 2026 को प्रदेश पदाधिकारियों की नई सूची जारी की। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की सहमति और मोर्चा प्रभारी तरुण बंसल से परामर्श के बाद जारी इस सूची में सुशील यादव को प्रदेश सोशल मीडिया सह-संयोजक बनाया गया है।
यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब नगर निगम चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के बाद सुशील यादव की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चाएं गर्म थीं। सियासी उठापटक के बीच उन्हें हाशिये पर पहुंचा हुआ मानने वालों को अब संगठन के इस फैसले पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। जिस राजनीतिक अध्याय पर पूर्णविराम लगाने की अटकलें थीं, उसी में अब नया पन्ना जुड़ गया है।
पुराना संगठनात्मक अनुभव बना ताकत
सुशील यादव का राजनीतिक सफर केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा है। वह वर्ष 2021 से 2023 तक दक्षिणी रुद्रपुर के मंडल अध्यक्ष, वर्ष 2019 से 2024 तक रुद्रपुर नगर निगम के पार्षद और वर्ष 2014 से 2016 तक भाजपा ओबीसी मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वह जिला सह-संयोजक शिक्षा प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
इन अनुभवों के बीच प्रदेश स्तर पर मिली नई भूमिका उनके लिए संगठन में अपनी सक्रियता को और धार देने का अवसर है। सोशल मीडिया आज राजनीतिक संवाद, जनसंपर्क और संगठन की बात जनता तक पहुंचाने का अहम माध्यम बन चुका है। ऐसे में यह जिम्मेदारी सुशील यादव के लिए अपनी संगठनात्मक क्षमता साबित करने की नई कसौटी भी होगी।
विरोधियों के लिए सियासी संदेश, यादव के लिए अग्निपरीक्षा
स्थानीय राजनीति में इस नियुक्ति को सुशील यादव की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। टिकट कटने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाए जा रहे कयासों के बीच संगठन का यह फैसला बताता है कि चुनावी टिकट न मिलना राजनीतिक सफर का अंतिम पड़ाव नहीं होता।
हालांकि इसे किसी गुट की हार या किसी विरोधी की साजिश की पुष्टि मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इतना जरूर है कि नई जिम्मेदारी ने सुशील यादव को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब उनके सामने अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने, संगठन की डिजिटल मौजूदगी मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रियता साबित करने की चुनौती होगी।
फिलहाल, सुशील यादव की नियुक्ति ने रुद्रपुर के सियासी समीकरणों में नई हलचल पैदा कर दी है। टिकट कटने के बाद उठे सवालों के बीच मिली यह जिम्मेदारी उनके समर्थकों के लिए उत्साह का विषय है, तो राजनीतिक विरोधियों के लिए नए आकलन का मौका। सियासत में वापसी का असली दम अब नारों से नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारी पर उनके प्रदर्शन से तय होगा।







