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सीएम धामी के अपने गोद लिए गांव नहीं पहुंच पाए, खराब सड़क के कारण

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एफएनएन, गैरसैंण : गैरसैण के भराड़ीसैंण में डेढ़ दिन में मॉनसून सत्र की इतिश्री कर सरकार वापस देहरादून लौट आई है. अब गैरसैंण और भराड़ीसैंण फिर से वीरान से हो गए हैं. चंद घंटों के इस मेले से वहां के आसपास के गांव पर क्या कुछ असर पड़ रहा है,

इस बार गैरसैंण से डेढ़ दिन में ही लौट आई सरकार: साल भर में एक या दो मौके ऐसे आते हैं, जब उत्तराखंड की पूरी सरकार देहरादून से उठकर राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण में होती है. साल भर में गैरसैण में लगने वाले विधानसभा सत्र की अवधि बमुश्किल चार से पांच दिन की होती है. इस बार तो उत्तराखंड के इतिहास में यह रिकॉर्ड ही बन गया कि डेढ़ दिन का सबसे छोटा सत्र जिसमें मात्र 2 घंटा 40 मिनट सदन चला.

डेढ़ दिन का सरकारी मेला, फिर अंधेरी रात: सरकार पूरे लाव लश्कर के साथ जैसे ही गैरसैण पहुंची थी, वैसे ही अगले दिन लौट आई. उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जन भावना के केंद्र में रहे गैरसैण प्रस्तावित स्थाई राजधानी के विषय पर स्थानीय ग्रामीणों का क्या कुछ कहना है. क्या समूचे पहाड़ और गैरसैंण के लोगों का राजधानी के रूप में ये सपना सच हो पाएगा? यही नहीं साल भर में सरकार की गैरसैण में आवाजाही से भी क्या कुछ फर्क यहां के स्थानीय निवासियों को पड़ता है, यह जानने के लिए हमने गैरसैण के भराड़ीसैंण विधानसभा स्थल के नजदीक मौजूद सारकोट गांव की ओर रुख किया और वहां की स्थिति जानी.

गोद लिए गांव सारकोट में सड़क खराब होने से नहीं पहुंच पाए CM: गैरसैण, भराड़ीसैंण के नजदीक में मौजूद सारकोट वही गांव हैं, जिस गांव को मुख्यमंत्री ने गोद लिया है. एक महत्वपूर्ण पहलू इस गांव का यह भी है कि यहां पर सबसे युवा प्रधान के रूप में 21 वर्ष की प्रियंका नेगी प्रधान बनी हैं. सरकार भराड़ीसैंण में थी तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इस गांव में जाने की योजना बनाई. लेकिन प्रधान प्रियंका ने ही हमें बताया कि गांव की सड़क इतनी खराब थी कि मुख्यमंत्री वहां नहीं जा पाए.

सारकोट की प्रधान प्रियंका खुद सीएम से मिलने पहुंचीं: हालांकि प्रदेश की सबसे युवा प्रधान प्रियंका नेगी को मुख्यमंत्री ने भराड़ीसैंण विधानसभा में मिलने के लिए बुलाया और वहीं पर प्रियंका से मुलाकात की. ईटीवी भारत की टीम ने इस गांव में जाने की कोशिश की, लेकिन हमारी टीम भी इस गांव तक नहीं पहुंच पाई, क्योंकि सड़क की स्थिति बेहद खराब थी. सड़क पर गाड़ी का चलना तो दूर पैदल चलना भी दुश्वार था.

सारकोट की सड़क थी बेहद खराब: भराड़ीसैंण से सारकोट तक जाने वाली सड़क और पैदल मार्ग दोनों में इतना कीचड़ था, इतनी मिट्टी थी कि यहां पर पैदल चलना भी मुश्किल था. हालांकि फिर भी हमने गांव की ओर जाने का प्रयास किया और काफी दूर तक जाकर जब सड़क बिल्कुल खराब स्थिति में थी, तो वहीं पर मौजूद कुछ ग्रामीणों से हमने बातचीत की.

सीएम के गोद लेने के बाद आए हैं सारकोट में बदलाव: स्थानीय निवासी दिनेश ने हमें बताया कि- गैरसैण के भराड़ीसैंण में लगातार पिछले दो दशक से हर एक सरकार ने कुछ ना कुछ अपना योगदान दिया है. अब धीरे-धीरे इसका असर गैरसैंण विधानसभा क्षेत्र के आसपास के इलाकों में देखने को मिल रहा है. हमारे गांव सारकोट को मुख्यमंत्री ने गोद लिया है और धीरे-धीरे इसका लाभ गांव को पहुंच रहा है. -दिनेश, ग्रामीण-

दिनेश ने हमें बताया कि उनके गांव में तकरीबन 250-300 लोग रहते हैं. गांव दूर से बेहद प्यारा और एक ही रंग में नजर आता है. दिनेश ने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा गोद लिए जाने के बाद गांव में यह रंग रोगन का काम हुआ है. उन्होंने कहा कि पिछले 1 साल से जब से मुख्यमंत्री ने गांव को गोद लिया, तो गांव में कुछ ना कुछ गतिविधियां होती रहती हैं. कई विभागों के अधिकारी आते हैं योजनाएं बताते हैं और निश्चित तौर से उसका लाभ होगा उन्हें उम्मीद है.

धीरे धीरे टूट रही स्थाई राजधानी की उम्मीद, जिला बनाने की मांग: स्थानीय दिनेश का कहना है कि राज्य गठन के समय गैरसैंण स्थाई राजधानी के रूप में भावनाएं बेहद संवेदनशील थी. स्थाई राजधानी को लेकर जोर शोर से बात होती थी. लेकिन आज धीरे धीरे उनकी उम्मीद टूट रही है. उनका कहना हैं कि-

गैरसैंण राजधानी आज एक सपने की तरह ही हो गया है. इसके पूरे होने की उम्मीद अब टाइम के साथ साथ कमजोर होती जा रही हैं. गैरसैण के लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है कि राजधानी के रूप में उनका सपना कभी साकार हो पाएगा.-दिनेश, ग्रामीण-

एक अन्य स्थानीय निवासी का कहना है कि स्थाई राजधानी ना सही, लेकिन जब भी यहां साल में एक दो बार विधानसभा सत्र आयोजित होते हैं और पूरी सरकार यहां होती है, तो उस समय गैरसैंण को कम के कम जिला बनाने की घोषणा कर दी जाए. या फिर कुछ ऐसा किया जाए, ताकि इस क्षेत्र का विकास हो.

कमिश्नरी बनाने पर गई त्रिवेंद्र की गद्दी! : हालांकि साथ में वह यह भी कहते हैं कि बतौर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कमिश्नरी बनाने की एक कोशिश जरूर की थी, लेकिन उसी कमिश्नरी के चक्कर में उनकी खुद की गद्दी चली गई. उन्हें कोई खास उम्मीद नहीं है कि गैरसैंण स्थाई राजधानी बन पाएगी क्योंकि ना तो कांग्रेस और न बीजेपी अब तक ऐसा कर पाई है और समय के साथ-साथ उन्हें यह और मुश्किल लगता है.

सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, स्थानीय लोगों को इसका क्या फायदा? सारकोट गांव के एक और युवा त्रिलोक सिंह से जब हमने गैरसैंण के भराड़ीसैण में होने वाले विधानसभा सत्र और उसके फायदे को लेकर उनका मत जाना, तो उन्होंने कहा कि सरकार आती है और दो दिन बाद चली जाती है, इससे स्थानीय लोगों को क्या फायदा होना है. सरकार अपना खर्चा कर रही है. थोड़ा बहुत स्थानीय लोगों को एक-दो दिन का रोजगार मिल जाता है, लेकिन इसका कोई खास फायदा गांव में देखने को नहीं मिल रहा है.-त्रिलोक सिंह, ग्रामीण-

उनके गांव सारकोट की सड़क को लेकर त्रिलोक सिंह का कहना है कि आज इस सड़क पर हम पैदल भी नहीं चल पा रहे हैं, तो यहां पर कैसे विकास की बात की जा सकती है. त्रिलोक सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री ने गांव गोद भी ले लिया, लेकिन फिर भी सड़क जैसी की तैसी है. इस पर चलना बहुत मुश्किल है. उन्होंने कहा कि गांव की सड़क तकरीबन 9 साल पहले कट चुकी है, लेकिन आज तक पक्की नहीं हो पाई है. वहीं इसके अलावा मौके पर हमें सड़क निर्माण का काम कर रहे ठेकेदार ने भी कुछ जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वह सड़क का निर्माण कर रहे हैं और आने वाले कुछ महीनों में सड़क का निर्माण हो जाएगा.

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