

फ्रंट न्यूज नेटवर्क ब्यूरो, बरेली। वर्ष 1994 में राममूर्ति गौतम ‘गगन’ (अब स्वर्गवासी )द्वारा स्थापित और वाणीपुत्रों को निरंतर मंच प्रदान करती रही बरेली की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘साहित्य सुरभि’ की नियमित मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने खूब रंग जमाए और भरपूर तालियां, वाहवाही भी बटोरी। संस्था की ओर से जनमन के कुशल चितेरे कवि स्वर्गीय ज्ञानस्वरूप कुमुद के सुपुत्र-सुकवि उपमेंद्र सक्सेना को ‘साहित्य गगन सम्मान’ से अलंकृत भी किया गया।

फतेहगंज पश्चिमी के मोहल्ला लोधीनगर में कुलदीप गंगवार के विद्यालय सनराइज चिल्ड्रेन एकेडमी में पत्रकार-कवि गणेश ‘पथिक’ के संयोजकत्व में उनकी दादी परम पूज्या स्व. श्रीमती केतकी देवी गंगवार, दादा परम पूज्य स्व. फूलचंद गंगवार, पिता स्व. श्री रामसिंह गंगवार और माता स्व. श्रीमती शीला देवी गंगवार की पावन स्मृति में आयोजित इस सरस-स्मरणीय काव्य गोष्ठी का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार-विशिष्ट अतिथि सुरेश ठाकुर की उत्कृष्ट वाणी वन्दना और मंचासीन अतिथियों द्वारा मां वीणापाणि और इन तीनों स्वर्गस्थ पितरों के चित्रों पर पुष्पार्चन, माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ।

लोकगीतकार रामधनी ‘निर्मल’ को उनके इस मवभावन भक्त्गीत पर भी खूब वाहवाही मिली-
हम अपने घट का पानी, घट-घट में मिलाकर देखें-
घट-घट का स्वामी हम पर बलिहार हो जाएगा।

समारोह की अध्यक्षता कर रहे कवि गोष्ठी आयोजन समिति के अध्यक्ष, वरिष्ठ साहित्यकार रणधीर प्रसाद गौड़ ‘धीर’ ने राष्ट्र को समर्पित गीत, प्रेम की तीव्रता बयां करती ग़ज़ल और यह छंद सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध सा कर दिया-
आग कैसी लगी है वतन में,
चैन है न किसी के भी मन में,
जाने कब कौन मुझको जला दे,
भय समाया हुआ हर दुर्जन में।

आरएसएस से संबद्ध संस्कार भारती के बरेली जिलाध्यक्ष, कवि गोष्ठी आयोजन समिति के सचिव, चर्चित गीतकार उपमेंद्र सक्सेना ने साहित्य गगन सम्मान से अभिनंदित होने के उपरांत मारक व्यंग पर केंद्रित अपना यह नया गीत सुनाया तो हर पंक्ति पर पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट और वाहवाहियों से गूंजता रहा-
मानवता में विष मत घोल
लाल बिहारी सॉरी बोल।
नीची कर ले मूछें अपनी
धमकी मत दे इसकी-उसकी
बिगड़ेंगे हालात बहुत फिर
अगर खोपड़ी अपनी खिसकी
अपना दूषित मुँह मत खोल
लाल बिहारी सॉरी बोल।
अभी नया खलनायक है तू
बात-बात पर लड़ जाता है
दिखी नहीं है धार कलम की
इसीलिए तो अड़ जाता है
निभा भले मानुष का रोल
लाल बिहारी सॉरी बोल।

साहित्य सुरभि के अध्यक्ष, छंदकार और आशु कवि रामकुमार कोली ने माता-पिता के सम्मान में यह मुक्तक पढ़कर वाहवाही बटोरी-
करे पिता का अनुसरण वह पुत्र होता है,
करे पिता का अनुकरण, वह सुपुत्र होता है
ले पिता से कार्य, सुचरित आचरण का व्याकरण,
प्रश्न का उत्तर सहेजे सूत्र होता है।

स्वास्थ्य खराब होने के उपरांत भी गोष्ठी में दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हुए शिष्ट हास्य-व्यंग के सर्जक दीपक मुखर्जी ‘दीप’ ने विसंगतियों पर कुछ इस तरह चोट की और वाहवाही लूटी-
अपमान को सम्मान
समझते हो तो तुम जानो।
करे गए उपकार को
अपना भौकाल
समझते हो तो तुम जानो।

कवि-गीतकार प्रताप मौर्य ‘मृदुल’ ने पांच सदी लंबे जनसंघर्ष के बाद बने भव्य राम मंदिर पर अपना चर्चित गीत गाया और इस मुक्तक से भी सबकी प्रशंसा अर्जित की-
आवारा फिरने वालों को छुट्टा बैल कहा जाता है-
कपटी जन का प्रेम दिखावा, मन का मैल कहा जाता है ।
कहने वाले तो कहते हैं ‘लिव इन’ में रहती हैं रखैलें,
और उन्हें रखने वालों को भी बिगड़ैल कहा जाता है।

मुख्य अतिथि-वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेश मधुकर’ ने सुंदर गीत और माहिया सुनाकर तालियां और वाहवाही बटोरी-
अपनों का संग मिला मन के सरवर में,
मनमोहक कमल खिला।
जीवन भर संग जिएं
आ जाओ साथी
छककर मकरंद पिएं।
काव्य गोष्ठी का काव्यमय बेहतरीन संचालन कर रहे राज शुक्ल ‘ग़ज़लराज’ ने इस खूबसूरत ग़ज़ल से महफिल लूटी-
वो फिर से अगर याद आने लगेंगे,
तो फिर भूलने में जमाने लगेंगे।
सुना देना न दर्द अपना किसी को,
तुझे लोग पागल बताने लगेंगे।
विशिष्ट अतिथि साहित्यकार सुरेश ठाकुर ने अपने सुंदर से गीत के साथ ही कई मुक्तकों से भी खूब तालियां और वाहवाही बटोरी-
सीरत तक तब पहुंचे, जब सूरत से हटकर देखा है-
औरत को जब भी हमने औरत से हटकर देखा है।

गोष्ठी के संयोजक, कवि-पत्रकार गणेश ‘पथिक’ ने अपने एक चर्चित गीत और इस ग़ज़ल से सबकी सराहना प्राप्त की-
किस तरह शिकारी के जाल से बचें पंछी,
पाल रखे हैं षड्यंत्र आजकल बसेरों ने।
ऐ ‘पथिक’ अंधेरों की सल्तनत मिटा देंगे,
दिल में अपने ठानी है सुरमई सवेरों ने।

मुक्तक सृजन में सिद्धहस्त रामप्रकाश सिंह ‘ओज’ ने चिर-परिचित अंदाज में अपने कई चर्चित मुक्तक सुनाए और पूरे सदन की खूब वाहवाही बटोरी-
अपने अनुभव सदा ही सदाबहार होते हैं,
और कड़वे वचन भी असरदार होते हैं।
बेटे और बेटियों के लिए माता-पिता,
‘पालनहार’ की ही तरह पालनहार होते हैं।

हास्य के चर्चित गायक मनोज दीक्षित ‘टिंकू’ के दोहे भी खूब सराहे गए-
हम सब तो एक बिंदु हैं काहे करत गुरूर,
जो जन करत गुरूर हैं, नीचे गिरत जरूर।

डॉ. धर्मराज यादव ने इस अतुकांत कविता से सबको अत्यधिक प्रभावित किया-
वैश्वीकरण के युग में
यहां रोज कुछ बन रहा है,
रोज कुछ घट रहा है,
यहां स्मृति का भरोसा नहीं,
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है

इनके अतिरिक्त राजकुमार अग्रवाल ‘राज’, डीपी शर्मा ‘निराला’, साहित्य सुरभि के महासचिव डॉ. राजेश शर्मा ‘ककरैली’, मिलन कुमार ‘मिलन’, हिंदी गजल को नया कलेवर देने वाले रामकुमार भारद्वाज ‘अफरोज़’ आदि ने भी अपनी श्रेष्ठ रचनाओं से काव्य गोष्ठी को सफलता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और खूब तालियां भी बटोरीं।

गोष्ठी को सफल बनाने में हरीश गंगवार, भरत (रवि) गंगवार, राहुल श्रीमाली, कुलदीप गंगवार, संजीव गंगवार, सचिन पंडित, धनन्जय गंगवार आदि ने भी सराहनीय सहयोग किया।





